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21 नवंबर, 2010

त्योहारों का अनोखा संगम कार्तिक पूर्णिमा व प्रकाश उत्सव

कार्तिक पूर्णिमा 

दीप-दान करती महिला
  हिंदू धर्म में पूर्णिमा का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है.प्रत्येक वर्ष पंद्रह पूर्णिमाएं होती हैं. जब अधिक मास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर १६ हो जाती है. कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है. इस पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि आज के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे.ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है. इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है. इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से भी पूरे वर्ष स्नान करने का फल   मिलता है.

                     छत्तीसगढ़ में महीने भर प्रात: तड़के उठ कर स्नान करने की प्राचीन परंपरा है ,आज कार्तिक पुन्नी स्नान का अंतिम दिन है .जलाशयों में स्नान कर लोग विशेष कर महिलाएं दीप-दान करती हैं. आवलें के वृक्ष की पूजा कर उसके नीचे भोजन बन कर  सामूहिक भोजन करती है .बचपन में इस त्यौहार का एक अपना ही आनंद था.

प्रकाश उत्सव  

गुरूनानक देवजी
    आज प्रकाश उत्सव भी है . सिखों के प्रथम  गुरू गुरूनानक देवजी का  जन्मोत्सव को प्रकाश उत्सव के रूप में मनाया जाता है . गुरु नानक देवजी का प्रकाश (जन्म) 15 अप्रैल 1469 ई. (वैशाख सुदी 3, संवत्‌ 1526 विक्रमी) में तलवंडी रायभोय नामक स्थान पर हुआ था . सुविधा की दृष्टि से गुरु नानक का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है. तलवंडी अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है. तलवंडी पाकिस्तान के लाहौर से 30 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। गुरु नानक जी ने पंडित हरदयाल से शिक्षा -दीक्षा ग्रहण की थी .( यह संयोग ही है कि मेरे पिताश्री का नाम भी श्री हरदयाल बजाज था ,वे  स्वर्ग सिधार चुकें है लेकिन ईश्वर की कृपा से  माता सावित्री देवी का ममत्व हमें आज भी मिल रहा है .)



 
जीती नौखंड मेदनी सतिनाम दा चक्र चलाया , भया आनंद जगत बिच कल तारण गुरू नानक आया ।

कार्तिक पूर्णिमा एवं प्रकाश उत्सव  की आपको बहुत बहुत बधाई !


      - अशोक बजाज  (Ashok Bajaj Raipur)
फोटो साभार गूगल

18 नवंबर, 2010

करगिल युद्ध के 11 साल बाद पाकिस्तान ने अपनी भूमिका स्वीकारी

       पको याद होगा कि पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने मई और जुलाई  1999 के मध्य भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पार करके भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी । पाकिस्तान ने दावा किया था  कि लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी।  करगिल युद्ध के दौरान  और उसके बाद भी पाकिस्तान कहता रहा  कि इस लड़ाई में उसका कोई सैनिक शामिल नहीं था। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना के कई सर्विंग जवानों को पकड़ा था , लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान यही राग अलापता रहा कि इस  युद्ध में उसका कोई हाथ नहीं है.
           युद्ध के 11 साल बाद पाकिस्तानी आर्मी ने अपने वेब साईट के माध्यम से करगिल  युद्ध में एक तरह से अपनी भूमिका स्वीकार करते हुए इस दौरान मारे गए अपने 453 सैनिकों को शहीद करार दिया है. अब तक पाकिस्तान करगिल युद्ध में अपनी किसी तरह की भूमिका से इनकार करता रहा है। युद्ध के 11 साल बाद उसने वेबसाइट पर बताया है कि ये सैनिक कहां और क्यों मारे गए।
               ये 453 सैनिक बटालिक-करगिल सेक्टर में मारे गए थे। सैनिकों की इस फेहरिस्त के पहले पेज पर कैप्टन कर्नल शेर और हवलदार ललक जान के नाम हैं। दोनों 7 जुलाई 1999 को करगिल में मारे गए थे। पाकिस्तान के सबसे बड़े सैन्य सम्मान 'निशान-ए-हैदर' से उन्हें नवाजा गया था। कई अन्य सैनिकों को भी मरणोपरांत तमगा-ए-जुर्रत जैसे पुरस्कारों से नवाजा गया था। करगिल में मारे गए ज्यादातर जवान नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के थे। यह अब पाकिस्तानी आर्मी का रेग्युलर रेजिमेंट है। पहले यह अर्धसैनिक बल था। 
             पाकिस्तानी सेना ने वेबसाइट पर अपने करगिल सैन्य अभियान का नाम भी उजागर किया है। बताया है कि ऑपरेशन 'खोह-ए-पैमा' के तहत नियंत्रण रेखा के पार भारतीय सरजमीं के सामरिक महत्व के पहाड़ों और चोटियों पर कब्जा किया गया था। इसे 'ऑपरेशन करगिल' भी बताया गया है। सैनिकों की मौत की वजहें अलग-अलग बताई गई हैं। इनमें 'कार्रवाई के दौरान मौत', 'दुश्मन की कार्रवाई', 'दुश्मन की फायरिंग', 'दुश्मन की आर्टिलरी की गोलाबारी' और 'सड़क दुर्घटना' जैसी वजहें प्रमुख हैं। मारे गए सैनिकों का नाम, रैंक, यूनिट, मौत की जगह और मौत की वजह भी बताई गई है। 
                                                                                      - अशोक बजाज 

रोहतक ब्लोगर सम्मलेन बनाम कोपेन-हेगेन सम्मलेन

हिंदी ब्लोगरों का सम्मलेन 21नवम्बर को रोहतक में आयोजित किया गया है .इस सम्मलेन में दुनिया भर के नामी-गिरामी ब्लोगरों के इकठ्ठा होने का संकेत है .छत्तीसगढ़ के भी ब्लोगर रवाना हो चुकें है . शायद आप भी इस सिलसिले में रोहतक में होंगें .श्री राज भाटिया भी पहुँच चुंकें है .उन्होंने आज अपने पोस्ट में अपना मोबाईल नंबर दिया है ( 09560922699 ).रात को ९.41 बजे उनसे चर्चा हुई .बड़े प्रसन्न चित्त थे .
लगता है अधिकांश ब्लोगर अपना लैप-टाप साथ ले गए है सो रास्ते का वृतांत भी लिखते लिखते जा रहे है .कुछ ने रेल-यात्रा तो कुछ ने बस-यात्रा के संस्मरण के पोस्ट लगायें है .  

रोहतक यात्रा प्रारंभ हो चुकी है. कल रायपुर से ४.50 को दुर्ग जयपुर एक्सप्रेस से रवाना हुए कोटा के लिए. स्टेशन पहुच कर देखा तो अपार भीड़ थी. इतनी भीड़ मैंने कभीकभी रायपुर रेलवे स्टेशन पर नहीं देखी थी. मैंने सोचा कि यदि ये सभी जयपुर की सवारी है तो आज की यात्रा का भगवान ही मालिक है. तभी रायपुर डोंगरगढ़ लोकल गाड़ी आ कर खड़ी हुयी. आधी सवारी उसमे चली गई. थोडा साँस में साँस आया. अपनी गाड़ी भी आकर स्टेशन पर लगी. अपनी सीट पर हमने कब्ज़ा जमा लिया. तभी एक बालक भी आकर बैठा. खिड़की से उसके मम्मी-पापा उसे ठीक थक यात्रा करने की सलाह दे रहे थे. उसके पापा ने मुझे मुखातिब होते हुए कहा-"सर जरा बच्चे का ध्यान रखना और इसके पास मोबाइल और रिजर्वेशन नहीं है. कृपया टी टी को बोल कर कन्फर्म करवा देना और आप अपना नंबर भी दे दीजिये मैं इससे बात कर लूँगा. मैंने भी हां कह कर एक मुफ्त की जिम्मेदारी गले बांध ली. क्या करें अपनी आदत ही ऐसी है. दिल है की मानता नहीं है. दो चार सवारियां और आ गई हमारी बर्थ पर.
"हर बात का वक्त मुकर्रर है, हर काम की शात होती है
वक्त गया तो बात गयी, बस वक्त की कीमत होती है"

 
कहने का तात्पर्य यह है कि रोहतक सम्मलेन की चर्चा नेट-जगत में ऐसे  हो रही है जैसे पिछले वर्ष कोपेन-हेगेन की हो रही थी .  सम्मलेन में मै  तो नहीं पहुँच पा रहा हूँ ,दूर से परिणाम की प्रतीक्षा  है .इस सम्मलेन का हश्र भी  कोपेन-हेगेन सम्मलेन  की तरह ना हो . सम्मलेन के आयोजकों एवं सभी प्रतिभागियों को मेरी शुभकामनाएं .


17 नवंबर, 2010

देवउठनी यानी छोटी दिवाली


आज कार्तिक शुक्ल एकादशी है यानी  देवउठनी एकादशी है. ऎसी मान्यता है कि आषाढ शुक्ल एकादशी से सोये हुये देवताओं के जागने का यह दिन है.  देवताओं के जागते ही  समस्त प्रकार के शुभ कार्य करने का सिलसिला शुरू हो जाता है. इसी दिन तुलसी और शालिग्राम के विवाह की भी प्रथा है। यह दिन मुहूर्त में विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह पूरे वर्ष में प़डने वाले अबूझ मुहूर्तो में से एक है. किसी भी शुभ कार्य को आज के दिन आँख मुंद कर प्रारंभ किया जा सकता है. यानी मुहूर्त देखने की जरुरत नहीं रहती. भगवान विष्णु को चार मास की योग-निद्रा से जगाने के लिए घण्टा, शंख, मृदंग आदि वाद्य यंत्रों  की मांगलिक ध्वनि के साथ इस श्लोक का वाचन किया जाता है ---

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते।
त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत्॥

हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।

किसानों की गन्ने की फसल भी तैयार है ,आज के दिन गन्ने की पूजा करके उसका उपभोग किया जाता है ; नए ज़माने के लोग इस परिपाटी को तोड़ चुकें है . देश में आज के दिन को छोटी दिवाली के रूप में भी मनातें है , कहने का तात्पर्य है कि आज भी पटाखों ,फुलझड़ियों एवं मिठाइयों का दौर चलेगा .


   आप सबको देवउठनी के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !