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21 अगस्त, 2016

मोदी व रमन ने बढ़ाया रेडियो का महत्व

रेडियो श्रोता दिवस (20 अगस्त) पर विशेष लेख


संचार क्रांति के इस दौर में रेडियो की महत्ता आज भी बरकरार है । 20वीं सदी में तो यह संचार व मनोरंजन का सबसे सशक्त व प्रभावी माध्यम था । आजादी के आंदोलन के दौरान और बाद में भी अनेक अवसरों पर रेडियो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । 15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होने की सूचना रेडियो के माध्यम से ही गांव-गांव तक पहुंची थी। दिल्ली के प्रमुख चैराहों में प्रधानमंत्री का संदेश सुनने के लिए रेडियो सेट लगाये गये थे । जनता को कोई महत्वपूर्ण सूचना व संदेश देना हो, प्राकृतिक आपदा से लोंगों को सावधान करना हो अथवा दंगा फसाद जैसी गतिविधियों से दूर रहने की अपील करना हो, सरकार के लिए रेडियो ही त्वरित सूचना का माध्यम था । रेडियो की कनेक्टिविटी सुदूर जंगलों, दुर्गम पहाड़ी इलाकों में होने के कारण आसानी से अधिकांश लोंगों तक सूचना पहुंच जाती थी । सीमा में तैनात सिपाहियों को देश-दुनिया की खबरों एवं मनोरंजन के लिए रेडियो ही एकमात्र सहारा था। हालांकि  दुनिया में रेडियो के प्रसारण का इतिहास काफी पुराना नहीं है, सन 1900 में मारकोनी ने इंग्लैण्ड से अमरीका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियो संदेश की शुरूआत की. उसके बाद कनाडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेंसडेन ने 24 दिसम्बर 1906 को रेडियो प्रसारण की शुरूआत की, उन्होंने जब वायलिन बजाया तो अटलांटिक महासागर में विचरण कर रहे जहाजों के रेडियो आपरेटरों ने अपने-अपने रेडियो सेट से सुना. उस समय वायलिन का धुन भी सैकड़ों किलोमीटर दूर चल रहे जल यात्रियों के लिए आश्चर्यचकित करने वाला था. संचार युग में प्रवेश का यह प्रथम पड़ाव था. प्रसिध्द साहित्यकार मधुकर लेले ने अपनी पुस्तक ‘‘भारत में जनसंचार और प्रसारण मीडिया’’ में लिखा है कि भारत जैसे विशाल और पारम्परिक सभ्यता के देश में बीसवीं सदी के आरंभ में जब आधुनिक विकास का दौर शुरू हुआ तो नये युग की चेतना के उन्मेष को देश के  

विशाल जनसमूह में फैलाना एक गंभीर चुनौती थी. ऐसे समय में जनसंचार के प्रभावी माध्यम के रूप में रेडियो ने भारत में प्रवेश किया. कालांतर में टेलीविजन भी उससे जुड़ गए. दोनों माध्यमों ने हमारे देश में अब तक अपनी यात्रा में कई मंजिलें पार की है. आकाशवाणी और दूरदर्शन ने भारत में प्रसारण मीडिया के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. भारत जैसे भाषा-संस्कृति-बाहुल्य और विविधता भरे देश में राष्ट्रीय प्रसारक की भूमिका और जिम्मेदारियां बड़ी चुनौती भरी रही हैं.
माना जाता है कि 20 अगस्त 1921 को भारत में रेडियो का पहला प्रसारण हुआ था, टाइम्स ऑफ इण्डिया के रिकार्ड के अनुसार  20 अगस्त 1921 को शौकिया रेडियो ऑपरेटरों ने कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और लाहौर में स्वतंत्रता आन्दोलन के समय अवैधानिक रूप से प्रसारण शुरू किया तथा इसे संचार का माध्यम बनाया. छत्तीसगढ़ के रेडियो श्रोताओ ने इसी दिन की याद में 20 अगस्त का चयन रेडियो श्रोता दिवस के रूप में किया. समूचे देश के रेडियो श्रोता संघ विभिन्न स्थानों पर 20 अगस्त को कार्यक्रम आयोजित करते हैं । रेडियो की महत्ता को बरकरार रखने में रेडियो श्रोता महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं । रेडियो के क्षेत्र में क्रांति तब आई जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जन-संवाद के लिए रेडियो का माध्यम बनाया, वे 3 अक्टूबर 2014 से प्रत्येक माह के किसी एक रविवार को सुबह 11 बजे ‘‘मन की बात’’ कार्यक्रम में आकाशवाणी के माध्यम से ज्वलंत मुद्दों की चर्चा करते हैं । ‘‘मन की बात’’ कार्यक्रम का असर ये हुआ कि बरसों से बंद पड़े रेडियो दुकानों के शटर पुनः खुल गये । वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी ने आधुनिक दौर में रेडियो के महत्व को बढ़ाया है । इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह ने 13 सितम्बर 2015 से आकाशवाणी के माध्यम से ‘‘रमन के गोठ’’ का प्रसारण शुरू किया । इस कार्यक्रम का प्रसारण भी प्रत्येक माह के द्वितीय रविवार को सुबह 10.45 बजे किया जाता है । रेडियो के माध्यम से मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह प्रदेश के चहुमुखी विकास के साथ-साथ शिक्षा, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य से जुड़ी बातों पर ना केवल चर्चा करते हैं, बल्कि जनता के सुझावों पर अमल भी करते हैं । यह कार्यक्रम पूरे प्रदेश में लोकप्रिय है । 
अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह ने रेडियो की महत्ता को पुर्नस्थापित किया है।    - अशोक बजाज
                                                                                                  

02 अगस्त, 2016

भाजपा का प्रशिक्षण महाभियान

नए जोश और संकल्प के साथ भाजपा का प्रशिक्षण वर्ग संपन्न 

देश में भारतीय जनता पार्टी ही एक ऐसी पार्टी है जो एक निश्चित विचारधारा पर चलती है तथा अपने कार्यकर्ताओं को समय समय पर अपने इस विचारधारा का बोध कराने के लिए प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन करती है. पिछले एक वर्ष से भाजपा का प्रशिक्षण महाअभियान चल रहा है इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ भाजपा का 4 दिवसीय प्रांतीय अभ्यास वर्ग 28 से 31 जुलाई 2016 तक चंपारण में आयोजित हुआ. इस प्रशिक्षण शिविर में लगभग 220 प्रशिक्षणार्थियों ने हिस्सा लिया.

श्री चंपेश्वर महादेव एवं महाप्रभु वल्लभाचार्य की इस पावन भूमि में सभी प्रशिक्षणार्थियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया तथा इस पर्यटन व धार्मिक नगरी में चार दिन रहकर ज्ञानार्जन प्राप्त किया. प्रशिक्षणार्थियों के ठहरने के लिए वल्लभ निधि ट्रस्ट भवन, गोपाल धर्मशाला तथा सुदामापुरी धर्मशाला में व्यवस्था की गई थी. लगभग 100 कार्यकर्ताओं को विभिन्न व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी दी गई थी.

सम्मलेन में चारों दिन प्रातः जागरण के साथ संघ की शाखा में योग एवं प्राणायाम का अभ्यास तो हुआ ही साथ ही साथ गाँव में स्वच्छता अभियान का सन्देश देने के लिए अंतिम दिन विभिन्न मुहल्लों में सफाई अभियान चलाया गया जो काफी प्रसंशनीय रहा. रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए जिसमें कार्यकर्ताओं के अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. सम्मलेन के अंतिम रात में अंचल के सुप्रसिद्ध हास्य कवि डा. सुरेन्द्र दुबे की कविताओं से कार्यकर्ता लोटपोट हुए . 

सम्मलेन की विशेषता यह रही कि भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन श्री रामलाल जी के अलावा श्री महेश चन्द्र शर्मा जी, श्री अरुण कुमार जैन जी, श्री मुरलीधर राव जी, श्री सौदान सिह जी, श्री वी.सतीश जी, श्री अनिल जैन जी, श्री विनय सहस्त्रबुद्धे जी प्रशिक्षण देने केंद्र से पहुंचे. प्रदेश के नेताओं में मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह जी, श्री दीपक विस्पुते जी, श्री श्रीगोपाल जी, सुश्री सरोज पांडे जी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री धरमलाल कौशिक जी, श्री पवन साय जी एवं श्री अजय चंद्राकर जी ने विभिन्न विषयों पर कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया. सहकारिता विषय पर मुझे भी बोलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.  सम्मलेन की एक विशेषता यह भी रही कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिह उद्घाटन व समापन दोनों में शामिल हुए. इसके अतिरिक्त प्रदेश सरकार के अन्य मंत्रियो ने भी अभ्यास वर्ग में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. संसद के वर्षाकालीन सत्र के कारण सांसदगण सत्र के अंतिम दो दिन ही उपस्थित हो सके. प्रदेश की राजनीति में विशेषकर भाजपा के विकास यात्रा में मील का पत्थर शामिल होने वाली इस चार दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग में राष्ट्र के समक्ष चुनौतियां, सामाजिक समरसता, सैद्धांतिक अधिष्ठान, कार्यकर्ताओं का व्यक्तित्व विकास, हमारा विचार परिवार, भाजपा का इतिहास व विकास, सुशासन, सहकारिता, विदेश नीति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एकात्म मानववाद, हमारी कार्यपद्धति, सत्ता व संगठन में समन्वय तथा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, इतिहास व धरोहर जैसे गूढ़ विषयों पर विषय विशेषज्ञों ने अपनी बातें रखी तथा कार्यकताओं के प्रश्नों का समाधान किया. संगठन के तपे व मंजे हुए इन नेताओं के ज्ञान व मार्गदर्शन से कार्यकर्ताओं में नई उर्जा का संचार हुआ तथा नए जोश और नए संकल्प के साथ इस चार दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग का समापन हुआ. 
 

प्रशिक्षण वर्ग की झलकियाँ 


















06 जुलाई, 2016

जूपिटर में समाया जूनो


अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का "जूनो" नाम का उपग्रह पांच साल के सफर के बाद जूपिटर यानी बृहस्पति की कक्षा में आज सफलतापूर्वक स्थापित हो गया. जूनो से इसका रेडियो संदेश मिलते ही नासा के कैलिफ़ोर्निया के पासाडेना स्थित मिशन कंट्रोल रूम में ख़ुशी का ठिकाना ना रहा. ग़ौरतलब है कि से संदेश 80 करोड़ किलोमीटर की दूरी से पृथ्वी पर मिला. यह नासा के वैज्ञानिकों की बहुत बड़ी कामयाबी तथा दुनिया के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है.

जूनो अगले क़रीब डेढ़ साल तक बृहस्पति के 37 चक्कर लगाएगा. इस दौरान जूनो यह पता लगाएगा कि बृहस्पति बना कैसे था. अपना काम पूरा करने के बाद जूनो बृहस्पति के वातावरण में दाखिल होकर ख़ुद को ख़त्म कर लेगा.

बृहस्पति के बारे में माना जाता है कि सौर मंडल में सबसे पहले यही ग्रह बना. साथ ही यह भी माना जाता है कि सूर्य से अलग होने के क्रम में उसके कई तत्व और गैसें इसमें शेष रह गई. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस अभियान के जरिए अतीत की खिड़की से पीछे झांकने का मौका मिलेगा और सौरमंडल के निर्माण प्रक्रिया के कुछ साक्ष्यों का पता लगेगा. इस अंतरिक्ष यान में ऐसे उपकरण लगाए गए हैं जो बृहस्पति के घुमावदार बादलों की परत के नीचे झांकने में भी कामयाब होंगे.

सबसे पहले बृहस्पति के वातावरण में पानी की मौजूदगी को मापने पर ध्यान दिया जाएगा जिससे ग्रह की बनावट के तरीके की जांच की जा सके. पिछले अभियान में बृहस्पति के वातावरण में पानी की कोई मौजूदगी नहीं पाई गई थी और वैज्ञानिकों को आश्चर्य हुआ था कि ऐसा कैसे हो सकता है. जूनो बृहस्पति के कोर का पता लगाने के लिए उसके चुंबकीय और गुरुत्वीय क्षेत्रों का नक्शा खींचेगा. साथ ही यह ग्रह की बनावट, तापमान और बादलों को भी मापेगा और पता लगाएगा कि कैसे इसकी चुंबकीय शक्ति वातावरण को प्रभावित करती है.

दो दशक पहले गैलिलियो नाम का पहला और एकमात्र अं​तरिक्ष यान बृहस्पति की कक्षा में स्थापित किया जा सका था. बृहस्पति की पहली यात्रा 1973 में पायनियर 10 ने की थी. नासा ने जूनो मिशन को 2011 में रवाना किया था. इस मिशन पर क़रीब एक अरब डॉलर की लागत आई है. बहरहाल यह 21 वी सदी की ऐतिहासिक सफलता है इसके लिए सभी वैज्ञानिक बधाई के पात्र है. 

03 जून, 2016

छग में अब आयाराम गयाराम की संस्कृति विकसित होगी

 छत्तीसगढ़ में तेजी से बढ़ते राजनीतिक घटनाक्रम में एक नया मोड़ तब आ गया जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजीत जोगी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर नई पार्टी बनाने का एलान कर दिया । असम व केरल की सत्ता गंवाने के गम में डूबी कांग्रेस के लिए जोगी का पार्टी छोड़ना किसी चक्रवात से कम नहीं है । वैसे भी देश में कांग्रेस की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई है । लोकसभा तथा विभिन्न राज्यों में लगातार पस्त होने के बाद कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा चल रही है । यह अलग बात है कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी कांग्रेस संगठन की कमान गांधी परिवार के हाथ में ही होगी । बहरहाल नेतृत्व परिवर्तन के सुगबुगाहट के बीच अजीत जोगी का कांग्रेस से नाता तोड़ने का निर्णय पार्टी की मुसीबज ही बढ़ायेगा । 

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में संगठन एवं जोगी घड़े के बीच पिछले 1 वर्ष से जो अन्तर्द्वंद चल रहा है उससे यह महसूस होने लगा था कि अजीत जोगी किसी ना किसी दिन स्व. विद्याचरण शुक्ल की राहों में चलकर कांग्रेस को चुनौती देंगें । आखिरकार हुआ भी वही जब राज्यसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी की घोषणा से आहत पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कांग्रेस छोड़ने की सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी । उनकी यह घोषणा नई पार्टी के गठन की ओर बढ़ते संकेत का परिचायक है । नौकरशाह से राजनीति में आये अजीत जोगी ने कांग्रेस में शामिल होकर कांग्रेस के एक बहुत बड़े व्होट बैंक पर अपना प्रभाव जमा लिया है । अलग पार्टी बनाने से इस व्होट बैंक का कितना हिस्सा उनके साथ जायेगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि विधानसभा चुनाव में अभी काफी वक्त है । लंबे समय तक लोगों को अपने साथ बांधे रखना आसान काम नहीं है । छत्तीसगढ़ के मतदाता सामान्यतः द्विदलीय पद्धति को स्वीकार करते हैं । छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस दो बड़ी राजनैतिक शक्तियां है । दोनों की अपने अपने प्रतिबद्ध मतदाता है तथा दोनों के नीचले स्तर तक ईकाई है । ऐसी स्थिति में राजनीति की तीसरी शक्ति को मतदाता कितना स्वीकार करेंगें यह तो वक्त ही बतायेगा । भूतकाल में तीसरी शक्ति बनाने की कई बार कोशिश हुई है लेकिन जनता ने उसे कतई स्वीकार नहीं किया । स्व. विद्याचरण शुक्ला की एन.सी.पी. को उस समय एकाध सीट ही मिल पाई थी लेकिन 7 प्रतिशत मत प्राप्त करके उनकी पार्टी ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया ही था । श्री जोगी भी यदि नई पार्टी बनाते हैं तो उसका नुकसान कांग्रेस को ही होना है । छत्तीसगढ़ के कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां कांग्रेस कभी हारी ही नहीं, ऐसी सीटों में हो सकता है जोगी की नई पार्टी या तो अपना वर्चस्व जमा लेगी अथवा कांग्रेस को इतना नुकसान कर देगी कि उसका प्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिल जाय । 

छत्तीसगढ़ में पिछले 12 वर्षो में डा. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने विकास के दम पर अपना गहरा पैठ बना लिया है । लोंगों को वो सुविधायें भी मिल रही है जो उन्हें कभी कांग्रेस सरकार में संभव भी नहीं थी । इस स्थिति में कांग्रेस के अन्तर्द्वंद ने डा. रमन सरकार की चौथी पारी का मार्ग प्रशस्त कर दिया है । मगर इस घटनाक्रम को महज दलगत राजनैतिक नफा नुकसान के दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं होगा क्योंकि अन्य राज्यों की तरह यदि तीसरी शक्ति का उदय होगा तो छत्तीसगढ़ की राजनैतिक संस्कृति पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा । किसी नेता को अपने दल में अपेक्षाकृत महत्व नहीं मिलेगा तो अन्य दल में जाने का रास्ता तलाश करेगा, उसके पास विकल्प भी रहेगा। आयाराम गयाराम की संस्कृति विकसित होगी तथा विभिन्न दलों में कार्य करने वाले निष्ठावान व मर्यादित कार्यकर्ताओं के बजाय अवसरवादी व मौकापरस्त कार्यकर्ताओं का वजन बढ़ जायेगा । देश के अधिकांश राज्यों में यह देखने को भी मिल रहा है । कहने का तात्पर्य यह है कि राजनैतिक मूल्यों का पतन हो जायेगा । यह स्थिति लोकतंत्र व विकास दोनों के लिए खतरनाक है । 



अशोक बजाज
अध्यक्ष
छ.ग. राज्य सहकारी बैंक मर्या.
(अपेक्स बैंक) रायपुर