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08 अक्तूबर, 2014

शरद पूर्णिमा की आप सब को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !





चिटिक अँजोरी निर्मल छैंहाँ

गली गली बगराए वो

पुन्नी के चंदा, मोरे गाँव मा !



शरद पूर्णिमा की आप सब को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ! 
- अशोक बजाज 

06 अक्तूबर, 2014

अंत्योदय बनाम सहकारिता


    भारतीय संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुखी व समृद्ध बनाना है। हमारी संस्कृति कहती है कि हम  परस्पर सहयोग व समन्वय से अपना जीवन यापन करें। मनुष्य के ऊपर अपने परिवार व समाज को पोषित करने की महती जिम्मेदारी होती है। इसके लिए वह नाना प्रकार के आर्थिक उपक्रम करता है। दूसरों का अनहित किये बिना अपना हित करना हमारी जीवन पद्धति है। इसी जीवन पद्धति के तहत ‘‘एक के लिए सब और सब के लिए एक’’ की भावना विकसित हुई। यह हमारी सनातन जीवन पद्धति है जो हमें विरासत में मिली है। इसी को सहकारिता का नाम दिया गया है। जब हम सहिष्णुता, समभाव और समन्वय की बात करते हैं तो उसका अर्थ सहकारिता ही होता है। सहकारिता की भावना हमें मिलजुल कर काम करने की प्रेरणा देती है।


    भारत के संदंर्भ में अगर हम बात करे तो यहां अमीरी और गरीबी की खाई दिनों दिन गहरी होती जा रही है। एक ओर जहां बहुसंख्यक लोग गरीबी, बेकारी एवं भूखमरी से जुझ रहें है, उन्हें रोटी कपड़ा और मकान नसीब नहीं हो रहा है तो दूसरी ओर समाज में ऐसे भी लोग हैं जिनके पास बेशुमार धन सम्पदा है। एक तरफ भूखमरी का आलम है जहां दो जून भरपेट भोजन के लाले पड़े है तो दूसरी ओर ऐसे लोग भी है जो खा खा के अस्पताल की शोभा बढ़ा रहें है अथवा मौत के गाल में समा रहें है। धनोपार्जन करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है क्योंकि उसे अपनी असीमित आवश्यकताओं को सीमित साधनों से पूरा करना है। इस परिपेक्ष्य में महान विचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा है ‘‘अर्थोपार्जन प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य होता है, परन्तु अर्थ के प्रति आसक्ति दुर्गुण ही कहा जाना चाहिए। सम्पत्ति की लालसा लिए हृदय देश, धर्म, समाज और संस्कृति से उदासीन हो जाता है। इस दुर्गुण से ग्रस्त व्यक्ति विवेकहीन और असमाजिक होता है। इससे उस व्यक्ति को तो कष्ट उठाने ही पड़ते हैं, साथ ही साथ समाज भी प्रभावित होता है। ऐसा व्यक्ति अर्थ को साधन नहीं, केवल साध्य समझने लगता है। चूंकि सम्पत्ति से प्राप्त विषय भोगों की कोई सीमा नहीं होती इसलिए ऐसे व्यक्ति के साथ-साथ समाज के भी भ्रष्ट और अकर्मण्य होने की आशंका रहती है।‘‘


     देश में एक दूसरा बड़ा तबका ऐसा भी है जिसकी कमाई सीमित है अपनी दैनंदिनी की आवश्यकता की आपूर्ति उसके लिए कठिन और दुष्कर कार्य है। यह तबका आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। इन्हें अपनी आजीविका के लिए दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। ये तबका परस्पर सहयोग व समन्वय से अपनी आर्थिक गतिविघियों का संचालन करते हैं तथा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते है।


    अंग्रेजों के शासनकाल में इस वर्ग का काफी आर्थिक शोषण हुआ। इन्हें ना ही अपने श्रम का उचित मूल्य मिलता था और ना ही सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर। अतः ये जमींदारों व साहूकारों के चंगुल में फंस गये और गरीबी, बेकारी, व भुखमरी के शिकार होने लगे। उन्हें अपने जीवन यापन के लिए बंधुवा मजदूर बनना पड़ा। अमीरी व गरीबी की खाई के साये में आजाद भारत का जन्म हुआ लेकिन दिशाहीनता के कारण यह समस्या नासूर बन गई तब पं. दीनद्याल उपाध्याय ने असमानता की खाई को पाटने के लिए अन्त्योदय के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि ‘‘हमारी भावना और सिद्धांत है कि वह मैले कुचैले, अनपढ़ लोग हमारे नारायण है. हमें इनकी पूजा करनी है, यह हमारा सामाजिक व मानव धर्म है. जिस दिन हम इनको पक्के सुन्दर, स्वच्छ घर बना कर देंगें, जिस दिन इनकें बच्चों और स्त्रियों को शिक्षा और जीवन दर्शन का ज्ञान देंगें, जिस दिन हम इनके हाथ और पांव की बिवाइयों को भरेंगें और जिस दिन इनको उद्योगों और धंधों की शिक्षा देकर इनकी आय को ऊंचा उठा देंगे, उस दिन हमारा भातृ भाव व्यक्त होगा.’’


    पं. उपाध्याय ने अपने अन्त्योदय सिद्धांत में कहा कि आर्थिक असमानता की खाई को पाटने के लिए आवश्यक है कि हमें आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के उत्थान की चिन्ता करनी चाहिए क्योंकि अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव दोनों समाज के लिए घातक है। हमारी नीतियां, योजनाएं व आर्थिक कार्यक्रम कमजोर लोगों को ऊपर लाने की होनी चाहिए ताकि वे भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके। उन्हें भी समाज के अन्य वर्ग के साथ बराबरी से खड़े होने का अवसर मिले। उन्होंने जिस जीवन शैली की जिक्र किया है वह सहकारिता ही है। सहकारिता की भावना तब कम होती है जब हमारी प्रवृति में नकारात्मक बदलाव आता है। काल परिस्थिति के कारण हमारी प्रवृति में नकारात्मक बदलाव समाज के लिए घातक होता है।


    बहरहाल पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के परिणाम स्वरूप उत्पन्न अर्थिक विषमता को खत्म करने का एकमात्र माध्यम सहकारिता ही हो सकता है। यह समाज के गरीब व कमजोर वर्ग के लोगों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करता है। यह परतंत्रता से स्वतंत्रता, विषमता से समानता तथा विपन्नता से सम्पन्नता के मार्ग में ले जाने का प्रभावी माध्यम है। इसमें परस्पर सहयोग व समन्वय की भावना होती है। 


    पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन हमें सहकारिता की भावना को विकसित करने की प्रेरणा देता है। समाज में मिलजुल कर काम करने की प्रवृति को विकसित करके हम कमजोर वर्ग के लोगों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बना सकते है। 
            

                         अशोक बजाज
                        अध्यक्ष
                        भाजपा सहकारिता प्रकोष्ट
                        छ.ग. रायपुर

03 अक्तूबर, 2014

नवां अन्जोर

महात्मा गाँधी और लाल बहादूर शास्त्री के जन्मदिन पर भारत सरकार ने स्वच्छता अभियान प्रारंभ किया जो कि अत्यंत ही सराहनीय कदम है. सरकार की एक अपील का ये असर हुआ कि समूचा समाज सफाई अभियान में जुट गया. 

वास्तव में सफाई का संबंध सीधे तौर पर हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा है, दूषित जल, दूषित हवा और दूषित भोजन का सेवन करने से मानव ही नहीं बल्कि जल, थल और नभ में रहने वाले समस्त जीवों को नाना प्रकार के कष्ट झेलने पड़ रहें है.  इसका कारण है गन्दगी. इसने हमारा सुख चैन छिन लिया है. गन्दगी फ़ैलाने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार मनुष्य ही है. अतः स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमें अपने स्वभाव में बदलाव करना पड़ेगा. 

मैंने जिला पंचायत रायपुर के अध्यक्ष पद (2005 से 2010 तक) पर रहते हुए इस विषय पर काफी काम किया था. उस समय छत्तीसगढ़ी में लिखी गई यह कविता काफी चर्चित हुई थी जिसे अपने ब्लाग पर पुनः लिख रहा हूँ ------      

गोकुल जईसे ह़र गाँव,
जिंहाँ ममता के छाँव !
सुन्दर निर्मल तरिया नरूवा,
सुग्घर राखबो गली खोर ,
तब्भे आही नवां अंजोर !

हर खेत खार में पानी ,
जिंहाँ मेहनत करे जवानी !
लहलहाए जब फसल धान के,
चले किसान तब सीना तान के !
घर घर में नाचे चितचोर ,
तब्भे आही नवां अन्जोर !!



24 सितंबर, 2014

भारतीय संस्कृति का मौलिक चित्रण है एकात्म मानववाद


असाधारण प्रतिभा एवं विशाल व्यक्तित्व के धनी पं. दीनदयाल उपाध्याय एक महान देशभक्त, कुशल संगठनकर्ता, मौलिक विचारक, दूरदर्शी, राजनीतिज्ञ ,पत्रकार और प्रबुद्ध साहित्यकार थे. आजादी के बाद देश की दशा पर उन्होंने गहन चिंतन किया तथा पूंजीवाद, साम्यवाद और समाजवाद के मुकाबले एकात्म मानववाद का दर्शन प्रस्तुत किया. एकात्म मानववाद वास्तव में भारतीय संस्कृति का ही मौलिक चित्रण है. भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण एकात्मवादी है तथा वह सम्पूर्ण जीवन तथा सम्पूर्ण सृष्टि का समन्वित विचार करती है. उन्होंनें कहा कि विशेषज्ञों की दृष्टि में टुकड़ों-टुकड़ों में विचार करना उचित हो सकता है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से यह उपयुक्त नहीं है. 

अंग्रेजी शासन काल में ”स्वराज” ही सबका एकमात्र लक्ष्य था लेकिन स्वराज के बाद हमारी क्या क्या प्राथमिकताएं होंगी तथा हम किस दिशा में आगे बढे़गे ? इस बात पर ज्यादा विचार व चिंतन ही नहीं हुआ. पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा कि हमें ”स्व” का विचार करने की आवश्यकता है. बिना उसके ”स्वराज्य” का कोई अर्थ नहीं.  स्वतन्त्रता हमारे विकास और सुख का साधन नहीं बन सकती. जब तक हमें अपनी असलियत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता और न उनका विकास ही संभव है. परतंत्रता में समाज का ”स्व” दब जाता है. इसीलिए राष्ट्र स्वराज्य की कामना करता हैं जिससे वे अपनी प्रकृति और गुणधर्म के अनुसार प्रयत्न करते हुए सुख की अनुभूति कर सकें. प्रकृति बलवती होती है, उसके प्रतिकूल काम करने से अथवा उसकी ओर दुर्लक्ष्य करने से नाना प्रकार के कष्ट होते हैं. प्रकृति का उन्नयन कर उसे संस्कृति बनाया जा सकता है, पर उसकी अवहेलना नहीं की जा सकती. आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि किस प्रकार मानव-प्रकृति एवं भावों की अवहेलना से व्यक्ति के जीवन में अनेक रोग पैदा हो जाते हैं, ऐसा व्यक्ति प्रायः उदासीन एवं अनमना रहता है. उसकी कर्म-शक्ति या तो क्षीण हो जाती है अथवा विकृत होकर वि-पथगामिनी बन जाती है. व्यक्ति के समान राष्ट्र भी प्रकृति के प्रतिकूल चलने पर अनेक प्रकार की व्याधियों का शिकार हो जाता है, आज भारत की अनेक समस्याओं का मूल कारण यही है. अग्रेजी शासन की दासता से मुक्ति पाने के बाद हमारी प्राथमिकता आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्य से देशवाशियों को इसकी आत्मानुभूति नहीं हुई. संस्कृति हमारे देश की आत्मा है तथा वह सदैव गतिमान रहती है. इसकी सार्थकता तभी है जब देश की जनता को उसकी आत्मानुभूति हो. देश को किस मार्ग पर चलना चाहिए इस पर चिंतकों में मतभेद था कुछ अर्थवादी ,कुछ राजनीतिवादी तथा कुछ मतवादी दृष्टिकोण के थे , इनमें से अलग हट कर पं. दीनदयाल उपाध्याय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जोर दिया उन्होनें कहा कि संस्कृति-प्रधान जीवन की विशेषता यह है कि इसमें जीवन के मौलिक तत्वों पर तो जोर दिया जाता है पर शेष बाह्य बातों के संबंध में प्रत्येक को स्वतंत्रता रहती है. इसके अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रत्येक क्षेत्र में विकास होता है. संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है. इस संस्कृति को ही हमारे देश में धर्म कहा गया है. जब हम कहतें है कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मज़हब, मत या रिलीजन नहीं, अपितु यह संस्कृति ही है.

 पं. दीनदयाल उपाध्याय ने मानव शरीर को आधार बना कर राष्ट्र के समग्र विकास की परिकल्पना की. उन्होनें कहा कि मानव के चार प्रत्यय है पहला मानव का शरीर , दूसरा मानव का मन , तीसरा मानव की बुद्धि और चौथा मानव की आत्मा. ये चारोँ पुष्ट होंगें तभी मानव का समग्र विकास माना जायेगा. इनमें से किसी एक में थोड़ी भी गड़बड़ है तो मनुष्य का विकास अधूरा है. जैसे यदि किसी के शरीर में कष्ट हो और उसे खाने के लिए 56 प्रकार का भोग दिया जाय तो उसकी खाने में रूचि नहीं होगी. इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति बहुत ही स्वादिस्ट भोजन कर रहा हो और उसी समय यदि उसे कोई अप्रिय समाचार मिल जाय तो उसका मन खिन्न हो जायेगा तथा भोजन का त्याग कर देगा. भोजन का स्वाद तो यथावत है, दुखद समाचार मिलने के पूर्व वह जैसा स्वादिस्ट था अब भी वैसा ही स्वादिस्ट है लेकिन अप्रिय समाचार मिलने से उस व्यक्ति का मन खिन्न हो गया और उसके लिए वह भोजन क्लिष्ट हो गया. यानी भोजन करते वक्त “आत्मा” को जो सुख मिल रहा था वह मन के दुखी होने से समाप्त हो गया. पं. दीनदयाल जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर,मन, बुद्धि और आत्मा ये चारोँ ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है , बुद्धि हाथ को कांटा निकालने के लिए निर्देशित करती है और हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और कांटें को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. 

सामान्यतः प्रत्येक मनुष्य अपने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारोँ की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की संज्ञा दी तथा इसे राष्ट्र के परिपेक्ष्य में प्रतिपादित करते हुए कहा कि राष्ट्र की स्वाभाविक प्रवृति ही उसकी संस्कृति है. उन्होंने कहा कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक बोली-भाषा, खानपान, वेशभूषा एवं रहन-सहन भले ही सबका अलग अलग हो पर समूचे भारत की आत्मा एक है.  जिस प्रकार मानव शरीर के निर्माण व संचालन में प्रत्येक अंग का योगदान होता है उसी प्रकार का योगदान देश के निर्माण व संचालन में सभी प्रान्तों व क्षेत्रों का होता है. सबको यह नहीं सोचना है कि देश ने मेरे लिए क्या किया बल्कि यह सोचना है कि हमने देश के लिए क्या किया ? स्वहित को त्यागकर राष्ट्रहित की चिंता करना ही हमारी मूल संस्कृति है यदि हमारी प्रवृति बदलेगी तो व्याधि बढ़ेगी ही. उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा. भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी. विश्व को यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं क्योंकि यही हमारी धरोहर है.  पं. उपाध्याय ने कहा कि अर्थ, काम और मोक्ष के बजाय धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है. इसी भावना के साथ हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं. 

                                                               लेखक - अशोक बजाज , पूर्व अध्यक्ष जिला पंचायत रायपुर