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29 सितंबर, 2011

नवरात्रि पर्व -- मैं भी तो इक माँ हूँ माता ...


            मैं भी इक माँ हूँ माता .........  

नवरात्रि पर्व की आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !




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photo by google ashok bajaj

27 सितंबर, 2011

भारत में महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव ?

महिलाओं के लिए आइसलैंड बेहतरीन :  भारत 141 वें स्थान पर
 
 
भारत में महिलाओं के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया जाता. 165 देशों में महिलाओं की स्थिति को लेकर न्यूजवीक पत्रिका ने एक सर्वे किया है. इसमें भारत को काफी नीचे यानी 141वें स्थान पर रखा गया है. दिग्गज पत्रिका न्यूजवीक ने महिलाओं के लिए 'अच्छे और खराब स्थानों' को लेकर सर्वे किया. सर्वे में यह देखा गया कि किस देश में महिलाओं को कैसे अधिकार दिए गए हैं और वहां महिलाओं के जीवन का स्तर कैसा है. आइसलैंड को महिलाओं के लिए सबसे उपयुक्त देश बताया गया है. कनाडा, डेनमार्क और फिनलैंड उसके बाद आते हैं. 

धरातल में भारत

एशियाई देशों में फिलीपींस एक मात्र ऐसा देश है जो टॉप 20 में है. भारत को काफी नीचे रखा गया हैं. 165 देशों की सूची में भारत 141वें स्थान पर हैं. बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका और चीन जैसे देश महिला अधिकारों और उनकी देखभाल के मामले में भारत से बेहतर आंके गए हैं. अमेरिका में यूनिवर्सल सोसाइटी ऑफ हिंदूइज्म के अध्यक्ष राजन जेद के मुताबिक भारत आर्थिक रूप से वैश्विक ताकत बनने की राह पर है लेकिन अधिकतर महिलाएं इस बदलाव से अछूती हैं. भारत में महिलाओं को अब भी बराबरी का हक नहीं मिल रहा है. उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है. जेद कहते हैं, "हमें भारत में अपनी महिलाओं को सशक्त करने की जरूरत है. कानून के तहत उनके साथ बेहतर व्यवहार होना चाहिए. उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीति में आने का मौका देना होगा. कामकाज के क्षेत्र में भी उन्हें ज्यादा मौके दिए जाने चाहिए."

दुनिया भर में महिलाओं की स्थिति को लेकर हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की भी एक रिपोर्ट आई. उस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं है. भारत में अब भी 39 फीसदी महिलाएं और पुरुष पत्नी की पिटाई को सही ठहराते हैं. शारीरिक  हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं में से सिर्फ 35 फीसदी ही पुलिस में  रिपोर्ट दर्ज कराती हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक प्रसव के दौरान होने वाली मौतों को रोकने के लिए भारत कदम उठा रहा है लेकिन वह वादों से काफी पीछे है.

समस्या का एक नमूना

भारत में आम लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं. गांवों और छोटे शहरों में प्रसव के दौरान महिलाएं सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहती हैं. लेकिन कई जगहों पर अस्पताल नाम की चीज ही नहीं है. ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, कमरों और अत्याधुनिक मशीनों की कमी है. ऑपरेशन थिएटर में पुराने पंखे दिखाई पड़ना आम बात है. ऑक्सीजन के जंग लगे सिलेंडर, जंग खाई हुई मशीनें हर किसी की निगाह में आ ही जाती हैं. कुछ गैर सरकारी संगठन कहते हैं कि सरकार सरकारी अस्पतालों के प्रति गंभीर नहीं है.

सरकारी अस्पतालों में मैनेजमेंट नाम की कोई चीज नहीं है. डॉक्टरों को इलाज भी करना है और अस्पताल का ध्यान भी रखना है. मशीन खराब होने जाने पर उन्हें अर्जी लिखनी है, अर्जी जिला प्रशासन को जाएगी, फिर वहां से आगे जाएगी. यह एक अंतहीन सी प्रक्रिया है. किसी को पता नहीं कि नए उपकरण कब आएंगे. वहीं निजी अस्पतालों में डॉक्टर सिर्फ इलाज करते हैं, बाकी काम मैनेजमेंट संभालता है. अस्पताल की सफाई, मशीनों की देखभाल और काम काज को व्यवस्थित करने का काम प्रबंधन करता है. यह कोई जादुई नुस्खा नहीं है जो सिर्फ निजी अस्पतालों पर ही लागू होता है. कहीं न कहीं यह बात सच है कि भारत में सरकारी अस्पतालों की संख्या बढ़ाने और उन्हें बेहतर बनाने से ज्यादा ध्यान निजी अस्पताल की फौज खड़ी करने में लगाया गया है.

24 सितंबर, 2011

देश की आत्‍मा ही उसकी मूल संस्‍कृति है

पं. दीनदयाल उपाध्‍याय की जयंती 25 सितम्‍बर पर विशेष
 

पं.दीनदयाल उपाध्याय 


                पं.दीनदयाल उपाध्याय एक महान राष्ट्र चिन्तक एवं एकात्ममानव दर्शन के प्रणेता थे. उन्होनें मानव के शरीर को आधार बना कर राष्ट्र के समग्र विकास की परिकल्पना की. उन्होनें कहा कि मानव के चार प्रत्यय है पहला मानव का शरीर , दूसरा मानव  का मन , तीसरा मानव की बुद्धि और चौथा मानव की आत्मा. ये चारोँ पुष्ट होंगें तभी मानव का समग्र विकास माना जायेगा. इनमें से किसी एक में थोड़ी भी गड़बड़ है तो मनुष्य का विकास अधूरा है. जैसे यदि किसी के शरीर में कष्ट है और उसे 56 भोग दिया जाय तो उसकी खाने में रूचि नहीं होगी. यदि  कोई व्यक्ति बहुत ही स्वादिस्ट भोजन कर रहा है  उसी  समय यदि कोई अप्रिय समाचार मिल जाय तो उसका मन खिन्न हो जायेगा. भोजन तो समाचार मिलने के पूर्व जैसा स्वादिस्ट था अब भी वैसा ही स्वादिस्ट है लेकिन अप्रिय समाचार से व्यक्ति का मन खिन्न हो गया इसीलिये उसके लिए भोजन क्लिष्ट हो गया. यानी भोजन करते वक्त "आत्मा" को जो सुख मिल रहा था वह मन के दुखी होने से समाप्त हो गया. पं. दीनदयाल जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर,मन, बुद्धि और आत्मा ये चारोँ ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है , बुद्धि हाथ को निर्देशित करती है कि तब हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और  कांटें को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सामान्यतः मनुष्य  शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन  चारोँ की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक  प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने  एकात्म मानव वाद की संज्ञा दी. उन्होंने  मनुष्य की इस स्वाभाविक प्रवृति को राष्ट्र के परिपेक्ष्य प्रतिपादित करते हुए कहा कि राष्ट्र की स्वाभाविक प्रवृति उसकी संस्कृति है. देश को किस मार्ग पर चलना चाहिए इस पर चिंतकों में मतभेद हैं कुछ  अर्थवादी ,कुछ राजनीतिवादी तथा कुछ मतवादी दृष्टिकोण के है, इनमें से अलग हट कर पं. दीनदयाल उपाध्याय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जोर दिया उन्होनें कहा कि संस्कृति-प्रधान जीवन की यह विशेषता है कि इसमें जीवन के मौलिक तत्वों पर तो जोर दिया जाता है पर शेष बाह्य बातों के संबंध में प्रत्येक को स्वतंत्रता रहती है.इसके अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रत्येक क्षेत्र में विकास होता है. संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है. इस संस्कृति को ही हमारे देश में धर्म कहा गया है. जब हम कहतें है कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मज़हब, मत या रिलीजन नहीं, अपितु  यह संस्कृति ही है.
                पं.दीनदयाल उपाध्याय की मान्यता थी  कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा. भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी. विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं ; उसमें तो शायद हमको  ही उल्टे कुछ सीखना पड़े. अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है. इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं.
                        भारतीय जीवन का प्रमुख तत्व उसकी संस्कृति अथवा धर्म होने के कारण उसके इतिहास में भी जो संघर्ष हुये हैं, वे अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिए ही हुए हैं तथा इसी के द्वारा हमने विश्व में ख्याति भी प्राप्त की है. हमने बड़े-बड़े साम्राज्यों के निर्माण को महत्व न देकर अपने सांस्कृतिक जीवन को पराभूत नहीं होने दिया . यदि हम अपने मध्ययुग का इतिहास देखें तो हमारा वास्तविक युध्द अपनी संस्कृति के रक्षार्थ ही हुआ है. उसका राजनीतिक स्वरूप यदि कभी प्रकट भी हुआ तो उस संस्कृति की रक्षा के निमित्त ही . राणा प्रताप तथा राजपूतों का युध्द केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं था अपितु धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ही था. छत्रपति शिवाजी ने अपनी स्वतंत्र राज्य की स्थापना गौ-ब्राह्मण प्रतिपालन के लिए ही की. सिक्ख-गुरुओं ने समस्त युध्द-कर्म धर्म की रक्षा के लिए ही किए . इन सबका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि राजनीति का कोई महत्व नहीं था अथवा राजनीतिक गुलामी हमने सहर्ष स्वीकार कर ली; बल्कि हमने  राजनीति को हमने जीवन में केवल सुख का कारण मात्र माना है, जबकि संस्कृति ही हमारा जीवन है.
                  आज भी भारत में प्रमुख समस्या सांस्कृतिक ही है वह भी आज दो प्रकार से उपस्थित है, प्रथम तो संस्कृति को ही भारतीय जीवन का प्रथम तत्व  मानना तथा दूसरा इसे मान लेने पर उस संस्कृति का रूप कौन सा हो विचार के लिए. यद्यपि यह समस्या दो प्रकार की मालूम होती है, किन्तु वास्तव में है एक ही. क्योंकि एक बार संस्कृति को जीवन का प्रमुख एवं आवश्यक तत्व मान लेने पर उसके स्वरूप के सम्बन्ध में झगड़ा नहीं रहता, न उसके सम्बन्ध में किसी प्रकार का मतभेद ही उत्पन्न होता है. यह मतभेद तो तब उत्पन्न होता है जब अन्य तत्वों को प्रधानता देकर संस्कृति को उसके अनुरूप उन ढांचों में ढंकने का प्रयत्न किया जाता है.
            पं. दीनदयाल उपाध्‍याय ने संस्‍कृति को प्रधानता देते हुये यह सिद्धांत  प्रतिपादित किया कि देश की संस्‍कृति ही देश की आत्‍मा है तथा यह एकात्‍म होती है. इसकी मैलिकता सदैव अक्षुण्‍ण रहती है.
पं. दीनदयाल जयंती के कार्यक्रम की झलकियाँ

22 सितंबर, 2011

खुश हो जाइये क्योंकि अब आप अमीर हैं



एक मजे की बात सुनो ........

प यदि भारत के किसी शहर में रहते हैं और आपका प्रतिदिन का खर्चा 32 रु. या उससे अधिक है तो आप अमीर हैं . यदि आप भारत के किसी गाँव में रहते हैं  और आपका प्रतिदिन का खर्चा 26 रु. या उससे अधिक है तो आप गरीब कदापि नहीं हैं  .जी हाँ योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दाखिल कर कहा है कि शहरी क्षेत्रों में 965 रुपए प्रति माह और ग्रामीण क्षेत्रों में 781 रुपए प्रति माह कमाने वाले व्यक्ति को हरगिज  ग़रीब नहीं कहा जा सकता. इस स्थिति में आप  सरकार की उन कल्याणकारी योजनाओं और सुविधाओं के पात्र नहीं है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए बनाई गई है .
 
नए मापदंड के मुताबिक़ शहर मे रहने वाला पांच सदस्यों का परिवार अगर महीने में 4,824 रुपए कमाता है, तो उसे कल्याणकारी योजनाओं के लिए योग्य नहीं कहा जा सकता. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले 5 सदस्यीय  परिवार के लिए मासिक 3,905 रुपए की कमाई उन्हें बी.पी.एल. से ऊपर यानी ए.पी.एल. की श्रेणी में नाम दर्ज करने के लिए काफी है . लिहाज़ा उन्हें  केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ़ से ग़रीबों के लिए चलाए जाने वाली योजनाओं से महरूम रहना होगा .

अब सवाल यह उठता है कि इतनी कमाई क्या एक परिवार की खाद्यान , आवास , चिकित्सा , शैक्षणिक आवश्यकता तथा अन्य पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है . भीषण बढ़ती महंगाई के युग में योजना आयोग ने बी.पी.एल. का जो नया पैमाना केंद्र सरकार की सहमति से प्रस्तुत किया है वह अत्यंत ही हास्यास्पद है तथा गरीबी का सीधा मजाक है . पिछले कुछ वर्षों से मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोग आर्थिक तंगी से बेहाल है , इनमें से कुछ लोग अपना नाम बी.पी.एल. में जुड़वा कर अपना किसी प्रकार गुजारा कर रहें है यदि योजना आयोग की सिफारिश ज्यों की त्यों लागू हो जाती है तो इन पर पहाड़ टूट जायेगा .