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16 जून, 2011

कबीरदास की साखियाँ


संत कबीरदास जी कवि व क्रांतिकारी समाज सुधारक थे.उन्होंने अपने काव्य में  सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक आडम्बरों के खिलाफ काफी  कटाक्ष किया है .कबीर का जन्म 1297 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ ,वे निडर और खरा खरा बोलने वाले कवि थे. उनके जन्म दिन पर उनकी लिखी साखियाँ प्रस्तुत है ----- 

दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय । जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥
तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय  । कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥ 2 ॥
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर  । कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ 3 ॥
गुरु  गोविन्द  दोनों  खड़े, काके लागूं पाँय     ।  बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥
बलिहारी  गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार । मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥
कबिरा   माला मनहि की, और संसारी भीख । माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥ 6 ॥
सुख मे सुमिरन ना किया दु:ख में किया याद । कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥ 7 ॥
साईं इतना  दीजिये, जा  मे कुटुम  समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 8 ॥
लूट सके  तो लूट  ले, राम  नाम   की  लूट । पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥ 9 ॥
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान । मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 10 ॥
जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप । जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 11 ॥
धीरे - धीरे  रे  मना ,  धीरे सब कुछ होय । माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 12 ॥
कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 13 ॥
पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय । एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ 14 ॥
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान । जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥ 15 ॥
शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान । तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 16 ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर । आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥ 17 ॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 18 ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ 19 ॥
नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग । और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥ 20 ॥
जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल । तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥ 21 ॥
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 22 ॥
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर । एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥ 23 ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 24 ॥
माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख । माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 25 ॥
जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग । कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥ 26 ॥
माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय । भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥ 27 ॥
आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥ 28 ॥
क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह । साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 ॥
गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच । हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥ 30 ॥
दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय । बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय ॥ 31 ॥
दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर । अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥ 32 ॥
दस द्वारे का पिंजरा, तामे पंछी का कौन । रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥ 33 ॥
ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय । औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥ 34 ॥
हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट । बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥ 35 ॥
कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार । साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥ 36 ॥
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय । यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥ 37 ॥
मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न होय । मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 38 ॥
सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप । यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥ 39 ॥
अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ । मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात ॥ 40 ॥
बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ । नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ 41 ॥
अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट । चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 ॥
कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय । ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥ 43 ॥
पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप । पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ 44 ॥
बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार । एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥ 45 ॥
हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध । हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध ॥ 46 ॥
राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस । रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥ 47 ॥
जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच । वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥ 48 ॥
तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार । सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥ 49 ॥
सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन । प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ 50 ॥
समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय । मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥ 
हंसा मोती विण्न्या, कुञ्च्न थार भराय । जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ 52 ॥
कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय । एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥ 53 ॥
वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल । बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल ॥ 54 ॥
कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय । चाहे कहँ सत आइना, जो जग बैरी होय ॥ 55 ॥
कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय । भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥ 56 ॥
जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय । सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥ 57 ॥
साधु ऐसा चहिए ,जैसा सूप सुभाय । सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥ 58 ॥
लगी लग्न छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय । मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥ 59 ॥
भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय । कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥ 60 ॥
घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार । बाल सनेही सांइयाँ, आवा अन्त का यार ॥ 61 ॥
अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार । जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥ 62 ॥
मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार । तुम दाता दु:ख भंजना, मेरी करो सम्हार ॥ 63 ॥
प्रेम न बड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय । राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥ 64 ॥
प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय । लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥ 65 ॥
सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग । कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥ 66 ॥
सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल । बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥ 67 ॥
छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार । हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥ 68 ॥
ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग । तेरा सांई तुझमें, बस जाग सके तो जाग ॥ 69 ॥
जा करण जग ढ़ूँढ़िया, सो तो घट ही मांहि । परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं ॥ 70
जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश । मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास ॥ 71 ॥
नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिंम नहीं शीतल होय । कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय ॥ 72 ॥
आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद । नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद ॥ 73 ॥
जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय । नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावें सोय ॥ 74 ॥
जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम । माता प्यारा बारका, भगति प्यारा नाम ॥ 75 ॥
दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गर्जी । कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥ 76 ॥
बानी से पह्चानिये, साम चोर की घात । अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह कई बात ॥ 77 ॥
जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव । कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव ॥ 78 ॥
फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त । जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥ 79 ॥
दाया भाव ह्र्दय नहीं, ज्ञान थके बेहद । ते नर नरक ही जायेंगे, सुनि-सुनि साखी शब्द ॥ 80 ॥
दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय । सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय ॥ 81 ॥
जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय । प्रेम गली अति साँकरी, ता मे दो न समाय ॥ 82 ॥
छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय । अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय ॥ 83 ॥
जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम । दोनों कबहूँ नहिं मिले, रवि रजनी इक धाम ॥ 84 ॥
कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय । टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ॥ 85 ॥
ऊँचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराय । नीचा हो सो भरिए पिए, ऊँचा प्यासा जाय ॥ 86 ॥
सबते लघुताई भली, लघुता ते सब होय । जौसे दूज का चन्द्रमा, शीश नवे सब कोय ॥ 87 ॥
संत ही में सत बांटई, रोटी में ते टूक । कहे कबीर ता दास को, कबहूँ न आवे चूक ॥ 88 ॥
मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहि दोष । यह कबिरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष ॥ 89 ॥
जब ही नाम ह्रदय धरयो, भयो पाप का नाश । मानो चिनगी अग्नि की, परि पुरानी घास ॥ 90 ॥
काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय । काया वैध ईश बस, मर्म न काहू पाय ॥ 91 ॥
सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह । शब्द बिना साधु नही, द्रव्य बिना नहीं शाह ॥ 92 ॥
बाहर क्या दिखलाए, अनन्तर जपिए राम । कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥ 93 ॥
फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम । कहे कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम ॥ 94
तेरा साँई तुझमें, ज्यों पहुपन में बास । कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास ॥ 95 ॥
कथा-कीर्तन कुल विशे, भवसागर की नाव । कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव ॥ 96 ॥
कबिरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा । कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा ॥ 97 ॥
तन बोहत मन काग है, लक्ष योजन उड़ जाय । कबहु के धर्म अगम दयी, कबहुं गगन समाय ॥ 98 ॥
जहँ गाहक ता हूँ नहीं, जहाँ मैं गाहक नाँय । मूरख यह भरमत फिरे, पकड़ शब्द की छाँय ॥ 99 ॥
कहता तो बहुत मिला, गहता मिला न कोय । सो कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय ॥ 100 ॥ 


       
                        


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15 जून, 2011

125 साल बाद मिली न्यूजीलैंड की सिलिका की परतें



न्यूजीलैंड की एक शोध संस्था ने बताया है कि सवा सौ साल पहले ज्वालामुखी की राख में दफन हुई सिलिका की सिलसिलेवार सतहें फिर से मिल गई हैं.न्यूजीलैंड के उत्तरी द्वीप की एक झील में मिलीं इस सिलिका के बारे में अभी तक यह समझा जा रहा था कि ये खो गई हैं.  सन 1886  में न्यूजीलैंड में हुए अब तक के सबसे बड़े ज्वालामुखी विस्फोट में करीब 100  लोग मारे गए थे तथा वहां का बहुत बड़ा हिस्सा राख व लावे में दब गया था.

सफेद छत के नाम से मशहूर सिलिका की सिलसिलेवार परतें न्यूजीलैंड के उत्तरी द्वीप की रोतोमाहना झील के तल पर मिली हैं. जनवरी में यह व्हाइट टेरेसेस मिलीं. एक जमाने में न्यूजीलैंड में व्हाइट और पिंक टेरेस पर्यावरण का मुख्य आकर्षण होती थीं.  समझा जा रहा था कि जून 1886  में माउंट तारावेरा में ज्वालामुखी विस्फोट के बाद यह नष्ट हो गईं.  लेकिन वैज्ञानिकों ने झील की सतह पर सोनार सर्वे के विश्लेषण के दौरान इन सिलिका की परतों के बारे में पता लगाया.

रोतोमाहना झील में सबसे गहरा हिस्सा 122 मीटर नीचे है. यह सिलिका की सतहें 60 मीटर नीचे हैं और एक दूसरे से 100 मीटर की दूरी पर हैं.

प्रोजेक्ट प्रमुख कोर्नेल डी रोंडे ने कहा कि झील की सतह नर्म तलछट और कीचड़ वाली है. जिस सोनर इमेज से व्हाइट टेरेसेस के बारे में पता चला वह प्रोजेक्ट खत्म होने के बाद मिलीं.  यह 100 मीटर लंबे आड़े हिस्से में है. लेकिन हम नहीं जानते कि यह सतह का कौन सा भाग है.



साभार गूगल, डी.डब्लू .हिंदी , Volcano लाइव



इसके लिए वीडिओ   .......
  
                                

14 जून, 2011

तिलचट्टा हो सकता है अस्थमा की वजह

सावधान ! अगर आपको दमा परेशान कर रहा है तो उसकी वजह आपके घर में घूमने वाला तिलचट्टा भी हो सकता है.  न्यूयॉर्क के बच्चों में अलग अलग तरह के अस्थमा के लिए तिलचट्टे को जिम्मेदार पाया गया है.

न्यूयॉर्क के कुछ मोहल्लों में पांच में से एक बच्चे को अस्थमा है जबकि दूसरे इलाकों में यह दर तीन प्रतिशत तक है. अतीत में इसके लिए शहर के व्यस्त ट्रैफिक, उद्योगों से निकलने वाले धुंए और बाहरी हवाई प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है.  लेकिन कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन इलाकों में अस्थमा की दर ज्यादा है उनमें बच्चों के खून में तिलचट्टे प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी पाए जाने की दोहरी संभावना है.

यह इस बात का सबूत है कि बच्चे इस कीड़े के संपर्क में रहे हैं और उन्हें उनसे एलर्जी है. इसके अलावा इन इलाकों के घरों की धूल में तिलचट्टों द्वारा उत्पादित एलर्जेन की मात्रा अधिक होती है.

एलर्जी पैदा करने वाला तिलचट्टा यानी काकरोज 
इस अध्ययन के लेखक मैथ्यू पर्जानोव्स्की कहते हैं कि यह अध्ययन इस बात का एक और सबूत है कि तिलचट्टे से संपर्क इस कहानी का एक हिस्सा है.  उनके अनुसार "तिलचट्टे के एलर्जेन सचमुच अस्थमा की उपस्थिति में अंतर में योगदान दे रहे हैं,  न्यूयॉर्क जैसे शहरों के शहरी माहौल में भी." जर्नल ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन के लिए पर्जानोव्स्की और उनकी टीम 7 और 8 साल से बच्चों वाले 239 घरों में गए.

इनमें से आधे अधिक अस्थमा दर वाले इलाकों में थे.  पुराने शोध में गरीबी को बचपन में अस्थमा की बढ़ी हुई दर की वजह बताया गया था.  लेकिन अध्ययन को आय के प्रभाव से मुक्त करने के लिए लेखकों ने नए शोध में मिड्ल इनकम हेल्थ पॉलिसी वाले परिवारों को शामिल किया.  सभी परिवार एक जैसी आय और एक जैसी चिकित्सा बीमा वाले थे.

अध्ययन में पता चला कि आधे से अधिक बच्चे अस्थमा का शिकार थे.

अपने दौरे के दौरान शोधकर्ताओं ने बच्चों के बिस्तर से धूल इकट्ठा की और बच्चों के खून का सैंपल लिया ताकि अस्थमा से जुड़े विभिन्न एलर्जेन के खिलाफ एंडीबॉडी की जांच की जा सके.

उच्च अस्थमा दर वाले इलाकों के 25 फीसदी बच्चों को तिलचट्टों से एलर्जी थी.  कम अस्थमा वाले इलाकों में रहने वाले सिर्फ 10 फीसदी बच्चों को तिलचट्टों की एलर्जी थी. पर्जानोव्स्की का कहना है कि तिलचट्टे अपने पीछे प्रोटीन छोड़ जाते जिसे लोग सूंघते हैं और उससे एलर्जी हो जाती है. यह अस्थमा का शिकार होने के अवसर बढ़ा देता है.  अधिक अस्थमा दर वाले इलाकों के घरों में कॉकरोच एलर्जेन के अलावा चूहे और बिल्ली से जुड़े एलर्जेन की सघनता अधिक थी.

पर्जानोव्स्की का कहना है कि घर में बिल्ली का होना स्वाभाविक रूप से एलर्जी की वजह नहीं होता. पिछले कुछ सर्वे में पाया गया था कि बिल्ली वाले घरों में रहने वाले बच्चों के एलर्जिक होने की संभावना अधिक होती है लेकिन नए अध्ययन में पाया गया है कि घर में बिल्ली का होने का मतलब बच्चे को अस्थमा होना नहीं होता. पर्जानोव्स्की कहते हैं, "यह जटिल है. बिल्ली से बचना अस्थमा के जोखिम को कम करता नहीं दिखता."

DW HINDI

12 जून, 2011

25 साल की जलसमाधि से बाहर निकला एक शहर - 3

कल के अंक में हमने  आपको अर्जेंटीना के एपेकुएन शहर के बारे में बताया था कि कैसे समुद्र में डूबा हुआ  एक शहर  25  साल बाद जलसमाधि से बाहर आया .आज हम आपको उस शहर के कुछ वीडियो दिखा रहें है . इस वीडियो में आप देखेंगे कि 25 साल की जलसमाधि के बाद उस शहर की आज क्या हालत हो गई है ................
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