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19 जून, 2010

मोदी-नीतिश विवाद


पाणिग्रहण को लगा ग्रहण- अशोक बजाज
ताजा घटनाक्रम के अनुसार बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बाढ़ पीड़ितों के सहायतार्थ प्रदत्त 5 करोड़ रूपिये लौटा दिये हैं। गुजरात सरकार ने यह राशि कोशी बाढ़ राहत के लिए प्रदान किया था। हमारा देश संघीय गणराज्य वाला देश है। जब किसी प्रांत में प्राकृतिक आपदा से जन-धन की भारी क्षति होती हैं तो दूसरे प्रांत अपनी क्षमता व परिस्थितियों के अनुसार सहायता करते हैं। इतना बड़ा देश है, यदा-कदा प्राकृतिक आपदायें आती ही रहती है। कहीं भूकंप के झटके पड़ते हैं कहीं बाढ़ आ जाती है, किसी राज्य में अनावृष्टि से सूखा संकट उत्पन्न हो जाता है। मानवीय संवदेना के तहत केन्द्र सरकार तथा राज्य की सरकारें मदद करती है। गुजरात सरकार ने कोशी नदी में आई भीषण बाढ़ के मद्देनजर बिहार सरकार को पीड़ितों के सहायतार्थ 5 करोड़ रूपिये आबंटित किये थे। जिसे ताजा घटनाक्रम के चलते बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने लौटा दिये। ऐसी बात नहीं कि बिहार सरकार ने यह कसम खाकर कि चाहे बिहार में कितना भी संकट आये हम किसी से कभी भी सहायता नहीं लेंगे बल्कि निकृष्ट राजनैतिक महत्वाकांक्षा के चलते यह राशि लौटाई गई है। बिहार की जनता इसे किस रूप में लेती है, यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन गुजरात व बिहार के मुख्यमंत्रियों का हाथ(पाणि) पकड़ कर जनता को एकता का संदेश देने वाला पोस्टर विवाद का मूल कारण बना है। भारत में पाणिग्रहण पवित्र व अटूट बंधन का परिचायक है लेकिन ताजाघटनाक्रम ने इस भावना को पलट दिया है। बिहार के मुख्यमंत्री को यह नागवार गुजरा कि पोस्टर में नरेन्द्र मोदी के साथ हाथ पकड़कर मंच में खडे़ होकर उन्हेंे अभिवादन करते हुये दिखाया गया है। पाणिग्रहण के इस पोस्टर से हो सकता है बिहार के लाखों लोगों को सुकुन मिला हो, यह भी हो सकता है कि दोनों गठबंधन दलों के लीडरों को सुकुन मिला हो लेकिन इससे नीतिश कुमार का क्या है ? उन्हें तो पाणिग्रहण की पवित्रता से ज्यादा अपनी कुर्सी की चिंता है। उन्हें लगता है कि यह पोस्टर उन्हें कुर्सी से बेदखल कर देगा यही कारण है कि पोस्टर देखते ही उनका गुस्सा फुट पड़ा। अपनी प्रतिक्रिया को वे दबा भी नहीं पाये। सभी मर्यादाओं को ताक में रखकर अतिथियों के सम्मान में आयोजित भोज को रद्द कर दिया। आज उन्होंने आपदा प्रबंधन के लिए प्रदत्त राशि लौटा कर अपने गुस्से का इजहार किया है . श्री नितीश कुमार नें गठबंधन धर्म का पालन भी नहीं किया। उन्हें अपने राजनैतिक हितों के मद्देनजर ऐसा कदम उठाना भले ही जरूरी रहा होगा लेकिन नैतिकता की दृष्टि से उनका यह कदम कितना वाजिब है इसका फैसला बिहार की जनता को ही करना है। हम जैसे लोगों को पाणिग्रहण शब्द का अर्थ बदलने से गहरा आघात लगा है।

14 जून, 2010

===  नवां अंजोर ===

गोकुल जईसे ह़र गाँव,
जिंहाँ ममता के छाँव !
सुन्दर निर्मल तरिया नरूवा,
सुग्घर राखबो गली खोर ,
तब्भे आही नवां अंजोर !

हर खेत खार में पानी ,
जिंहाँ मेहनत करे जवानी !
लहलहाए जब फसल धान के,
चले किसान तब सीना तान के !
घर घर में नाचे चितचोर ,
तब्भे आही नवां अन्जोर !!

(छत्तीसगढ़ी कविता)

- अशोक बजाज रायपुर

22 मई, 2010

-: जल जो न होता तो ये जग जाता जल :-

"जल जो न होता तो ये जग जाता जल"


चांदी सा चमकता ये नदिया का पानी , पानी की हर बूंद देती जिंदगानी !
अम्बर से बरसे जमीन पर मिले , नीर के बिना तो भैय्या काम ना चले !
ओ मेघा रे..........
जल जो न होता तो ये जग जाता जल, गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल !


फिल्म "गीत गाता चल" के इस गीत के गायक श्री जशपाल सिंह को वर्ष 1975 में यह एहसास हो गया था कि 2010 आते आते हम कितने जल संकट से घिर जायेंगे। आज चारों तरफ जल संकट को लेकर चर्चाओं का दौर चल रहा है तब इस गीत के भावार्थ को समझना प्रासंगिक हो गया है। आम आदमी से लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे सभी लोग जल संकट की चिंता में डूबे हैं। आज समूचा विश्व जल संकट से जूझ रहा है यहां तक कि भारत जैसे वनाच्छादित देश भी इससे अछूते नहीं हैं। हिम नदियां पिघल रही हैं, गंगोत्री पिघलकर प्रतिवर्ष 20 मीटर पीछे खिसक रही है। भारत-बांग्लादेश के मध्य स्थित विवादित द्वीप 'न्यू-मूर' जो 9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला था, पूरी तरह समुद्र में समा गया है। 1954 के आंकड़ों के अनुसार यह समु्रद तल से 2-3 मीटर ऊंचाई पर था। सुंदरवन के अनेक द्वीपों का अस्तित्व खतरे में पड ग़या है। भारत की सीमा से लगे बंग्लादेश में कई क्षेत्रों के डूबने से प्रभावित लोग भारत में शरण ले सकते हैं। हमें याद है कि अक्टूबर 2009 में मालद्वीप को डूबने से बचाने के लिए वहां के राष्ट्रपति ने समुद्र के अंदर मंत्रिमंडल की बैठक करनी पड़ी थी। सदियों तक बाढ़, सूखा एवं अकाल के कारण जनता को जलसंकट एवं अन्न संकट से जूझना पड़ेगा। देश में गरीबी, बेकारी एवं भुखमरी की स्थिति निर्मित हो जाएगी। चारों तरफ डायरिया, मलेरिया एवं डेंगू जैसी घातक बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाएगा। लगातार सूखे के कारण मैदानी इलाकों से महापलायन होगा। दिल्ली, बंगलोर, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे, रायपुर, भोपाल एवं इंदौर जैसे शहरों में जनसंख्या का दबाव बढ़ने से इन शहरों की आधारभूत सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक 20 से 30 प्रतिशत के तक पौधे तथा जानवरों की प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। वर्तमान में प्रति व्यक्ति पानी की खपत 1820 क्यूबिक मीटर है जो 2050 में घटकर 1140 क्यूबिक मीटर हो जायेगी। दरअसल यह दुष्परिणाम कोयला एवं तेल आधारित संयंत्रों के बेतहाशा इस्तेमाल के कारण हो रहा है। ए.डी.बी. की एक रिर्पोट के अनुसार आगामी 25 वर्षों में एशिया में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तीन गुणा बढ़ जाएगा। सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणों से मानव जगत को होने वाली क्षति का हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। यदि इस तथ्य पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो वर्ष 2050 तक दुनिया का तापमान 2 सेल्सियस बढ़ जाएगा तथा जलवायु परिवर्तन की गति बढ़ जाएगी। इस बदलाव के साथ प्राणी एवं वनस्पति जगत को सामंजस्य बैठा पाना मुश्किल होगा। यदि समय रहते उपाय सोचे जाएं तो इस भयावह संकट से उबरा जा सकता है। केवल चर्चा एवं चिंता से कुछ नहीं होगा, बल्कि इसके लिए हमें व्यावहारिक रुख अपनाना होगा। क्योंकि पृथ्वी के बढ़ते तापमान के लिए मनुष्य और केवल मनुष्य ही जिम्मेदार है। अत: मनुष्य को ही इसका उपाय ढूढ़ना होगा। आने वाले समय में वैकल्पिक उर्जा स्रोतों का प्रचलन बढ़ाना होगा। उर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के रूप में पवन उर्जा, सौर उर्जा एवं जैविक उर्जा का उपयोग कर के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साईड की मात्रा को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही कृषि व वन क्षेत्र में नई तकनीक का उपयोग कर हम इस संकट से उबर सकते हैं। आने वाले समय में कम बिजली खपत करने वाले लाईटिंग उपकरण तथा कम ईंधन से चलने वाली गाड़ियों का इस्तेमाल करना लाजिमी हो गया है। शासन स्तर पर भी तेजी से प्रयास करना होगा। विश्व की कुल आय का मात्र तीन प्रतिशत भी यदि जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए खर्च किया जाय तो वर्ष 2030 तक तापमान वृध्दि को 2 सेल्सियस तक रोका जा सकता है। छत्तीसगढ़ में इस गंभीर समस्या से निबटने के लिए शासन जल संरक्षण महा अभियान चला रही है। इस महाभियान के माध्यम से पेयजल, निस्तारी जल एवं सिंचाई जल के स्रोतों में वृध्दि का उपाय ढूंढा जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इस महाअभियान में स्वयं रुचि ले रहे हैं। उन्होंने वर्षा के जल को संग्रहित करने का प्लान बनाया है। छत्तीसगढ़ शासन का महाभियान अनुकरणीय है।