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14 दिसंबर, 2011

प्रयोगशाला में सृष्टि की तलाश



सर्न की विशाल भौतिक  प्रयोगशाला
सृष्टि हम सबके लिए एक पहेली है . वैज्ञानिक बरसों से इस पहेली को बुझने का प्रयास कर रहे है . "सर्न " के वैज्ञानिकों ने सृष्टि की उत्पत्ति करने वाले बिंदु को ढूंढ़ निकालने का दावा किया है .  स्विट्जरलैंड स्थित दुनिया की सबसे बड़ी भौतिक  प्रयोगशाला " सर्न  " में  बरसों से  इस बिंदु जिसे हिग्स बोसोन या गॉड पार्टिकल कहा जाता है की खोज की जा रही है . मजे की बात तो यह है कि सृष्टि की तलाश में हजारों वैज्ञानिकों के साथ भारत की महिला वैज्ञानिक डा. अर्चना शर्मा भी जुटी हुई है .  उन्होंने  सृष्टि के नजदीक पहुँचने का दावा करते हुए कहा है कि  हम भूंसे के खलिहान में सुई की तलाश कर रहे है .डा. शर्मा के मुताबिक हम  गॉड पार्टिकल के नजदीक जरुर पहुँच गए है लेकिन उसे पूरी तरह खोजने में साल भर और लग सकता है . यदि वैज्ञानिक  इसे खोज निकालने में सफल हो जाते है तो यह शताब्दी की सबसे बड़ी वैज्ञानिक सफलता मानी जायेगी अन्यथा यह पहेली केवल पहेली बन कर रह जायेगी . 

 

04 दिसंबर, 2011

पांडव नृत्य और जीवन का चक्रव्यूह

द्रोणाचार्य का चक्रव्यूह 
त्तराखंड में इन दिनों कड़ाके की ठण्ड पर रही है ,यहाँ का  न्यूनतम तापमान 4  डिग्री सेंटीग्रेट हो गया है .यदि तापमान गिरने का सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो 8-10  दिनों में शून्य डिग्री तक पहुँच जायेगा . यहाँ रात बहुत बड़ी तथा दिन बहुत छोटा है . सुबह 8 बजे के बाद सूर्योदय होता है तथा शाम 5 बजे सूर्यास्त होता है . सुबह 11 बजे तक लोग रजाई में जकड़े रहते है . कार्य की दृष्टि से सुबह 11 बजे से 3 बजे तक ही समय रहता है . यानी केवल 4 घंटे का दिन होता है .

पर्वतीय क्षेत्रों के सीढ़ीदार खेत 
वैसे भी इन दिनों उत्तराखंड के लोग कमोबेस खाली ही  रहते है . रुद्रप्रयाग जहाँ मै पिछले एक सप्ताह से रुका हूँ पूरा इलाका तीर्थाटन व पर्यटन क्षेत्र है .यहाँ से केदारनाथ लगभग 100  कि.मी. , बद्रीनाथ-180 कि.मी. , कर्णप्रयाग-35 कि.मी., जोशीमठ-125 कि.मी.एवं गुप्तकाशी-40 कि.मी. दूरी पर है .केदारनाथ और बद्रीनाथ के पट मई में खुलते है और नवंबर में बंद हो जाते है . पट खुलते ही श्रद्धालूओं व सैलानियों के आने जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है .इस मौसम में  तो बिरले लोग ही इधर आते है . अधिकांश लोगों की आजीविका इसी से जुड़ी है . इसके अलावा यहाँ आजीविका का मुख्य साधन कृषि है . धान , दलहन व तिलहन के फसल की कटाई हो चुकी है . किसानों ने गेहूं की बुवाई कर ली है , किन्ही किन्हीं खेतों में गेहूं के पौधें २-3 इंच ऊग आये है . इधर के खेत पहाड़ों के ऊपर छोटे छोटे व सीढ़ीनुमा होते है . सिचाई के साधन नहीं के बराबर है ,बरसात के अलावा पहाड़ों की ऊपरी सतह से झरते हुए जल के भरोसे ही रहना पड़ता है .  यह विडम्बना ही है कि इस इलाके में जीवनदायिनी गंगा की अनेक सहायक नदियाँ बारहों महीनें बहती है फिर भी यहाँ की खेती प्यासी है , किसानों के खेत सूखे है . यदि नदियों के जल का उदवहन कर खेतों तक पहुँचाया जाय तो कृषि के क्षेत्र में काफी उन्नति हो सकती है . बताया जा रहा है कि प्रदेश की खंडूरी सरकार ने लिफ्ट इरीगेशन की कुछ परियोजनाएं स्वीकृत की है ,  कुछ के काम भी शुरू हो गए है . वैसे नदी के जल से अनेक जल-विद्युत् परियोजनाएं संचालित हो रही है . जिसका विरोध गंगा बचाओ अभियान वाले कर रहें है हालाँकि इस इलाके में नदी के जल-प्रदुषण की बड़ी समस्या नहीं है .

 वैवाहिक कार्यक्रमों का जोर

जयमाला 
आजकल लोगों के पास काम कम है . शायद इसीलिये इस मौसम में शादियों का रिवाज है ,अमूमन शादियाँ दिन में ही होती है . चारोँ तरफ शादियों की धूम मची है . हमें भी एक कार्यकर्ता की लड़की की शादी में यहाँ के पदाधिकारियों के साथ शामिल होने का सौभाग्य मिला . कार्यालय से लगभग 1 कि.मी. ऊपर पहाड़ पर पैदल चलकर जाना पड़ा . स्थानीय लोग तो पहाड़ पर आसानी से चढ़ गए लेकिन हमारी तो स्वांस ही फुल गई , दो बार मेरे कारण पूरे काफिले को रूकना पड़ा . विवाह स्थल पर पहुंचें तो बारात पहले ही आ चुकी थी . मंच पर वर-वधु जयमाला हाथ में लिए संकेत का इंतजार कर रहे थे . जैसे ही वीडियोंग्राफर और फोटोग्राफर अपनी पोजीशन में आये दोनों ने एक दूसरे के गले में जयमाला डाल दी . फिर शुरू हुआ बधाई देने का सिलसिला . उसी समय लड़की की माँ ने जो भाजपा की कार्यकर्ता है हम सबको एक एक लिफाफा दिया . उसमें 10 रुपये का एक नया नोट था .मैंने उस लिफाफे में एक सौ का नोट डाला और वापिस कर दिया . दोपहर का भोजन भी वहीं करके वापस आ गए.

 पांडव-नृत्य

चक्रव्यूह की ओर रथ बढ़ते अभिमन्यु
गाँव गाँव में इन दिनों पांडव नृत्य का जोर है . कड़कड़ाती ठण्ड के बावजूद यह कार्यक्रम लगातार 20 - 25 दिनों  तक रात-दिन चलता है . अंतिम दिनों में पांडवों के स्वर्गारोहण का मंचन किया जाता है . रुद्रप्रयाग से लगभग 20 कि.मी. दूरी पर ग्राम " नारी " के पांडव नृत्य कार्यक्रम में हमें भी जाने का अवसर मिला ,यह गाँव केदार नाथ विधान सभा क्षेत्र में है . मेरे साथ जिलाध्यक्ष श्री वाचस्पति सेमवाल ,क्षेत्रीय विधायक श्रीमती आशा नौटियाल एवं अन्य  पदाधिकारी भी थे. रुद्रप्रयाग से सड़क के रास्ते हम लोग दोपहर 12  बजे सतेराखाल पहुंचें जहाँ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने ढोल मंजिरें के साथ स्वागत किया . वहां से लगभग 1 कि.मी.  पैदल खेतों के मेड़ों और पगडंडियों से होकर नीचे गए जहाँ एक खेत को समतल करके चक्रव्यूह बनाया गया था .  चारों तरफ लोगों का हुजूम लगा था . लोग दूर दूर से पैदल चलकर आये थे . एक किनारे में कुछ छोटी छोटी दुकाने लगी थी .पूरे मेले का दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा था . स्वागत की रस्म अदायगी के बाद हम लोग एक स्थान पर बैठ गए . सबसे पहले सावधान सावधान की हुंकार भरते हुए कौरवों दल का आगमन हुआ . कौरव दल का नेतृत्व गुरु द्रोणाचार्य कर रहे थे . द्रोणाचार्य ने एक एक करके सभी महारथियों को चक्रव्यूह के एक एक द्वार का जिम्मा दिया . कुछ ही देर में अभिमन्यु अपने साथियों के साथ पहुचे , अभिमन्यु को एक खाट में बैठा कर लाया गया . लगभग 10 - 12 नवजवान खाट को चारों तरफ से उठाये हुए थे . जैसे ही वे मंच के पास आये अभिमन्यु ने चार फीट उचाई से छलांग लगा कर चक्रव्यूह के प्रथम द्वार पर पहरा दे रहे जयद्रथ को ललकारा . जयद्रथ भी कहाँ चुकने वाला था उसने भी अपने अन्य साथियों को सावधान होने का संकेत दिया और अभिमन्यु से जा भिड़ा . दोनों तरफ से डायलाग हुए . अभिमन्यु जब कोई डायलाग बोलता था तब वहां उपस्थित 5 हजार लोग ताली बजाकर स्वागत करते थे .दोनों में पहले वाक-युद्ध फिर तीर-युद्ध उसके बाद गदा-युद्ध हुआ. अंत में मल-युद्ध में जयद्रथ मूर्छित हो गया .अभिमन्यु ने पहली फतह हासिल करने के बाद दूसरे द्वार की ओर रूखसत किया और हम लोग पास ही में स्थित एक प्राचीन मंदिर में माँ चंडी का दर्शन करके बिदा हो गए .


पांडव नृत्य की ओर बढ़ता कारवां

जयद्रथ और अभिमन्यु के युद्ध को मंच से निहारते अतिथि
गाँव के गणमान्य नागरिक अतिथियों का स्वागत करते हुए

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29 नवंबर, 2011

रुद्रप्रयाग : अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों का संगमस्थल





रुद्रप्रयाग :  अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों का संगमस्थल

 इन दिनों कुछ मित्रों के साथ उत्तराखंड की राजनैतिक यात्रा पर हूँ . यह भारत की देवभूमि है . कदम कदम पर यहाँ दर्शनीय स्थल है .गढ़वाल अंचल के रुद्रप्रयाग में हमारा केम्प है .यहाँ पर मन्दाकिनी नदी अलकनंदा नदी में मिलती है . दोनों नदियाँ पहाड़ को चीरती हुई यहाँ पर मिलती है . यह नदी  आगे भागीरथी नदी से मिलकर गंगा नदी कहलाती है .गंगा नदी पर आगे लिखने का अवसर ढूंढूंगा .आज तो रुद्रप्रयाग पर ध्यान आकर्षित कर कहा हूँ .रुद्रप्रयाग उत्तरांचल राज्य के रुद्रप्रयाग जिले का मुख्यालय है ,यह नगर पालिका है.रुद्रप्रयाग अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों का संगमस्थल है . यहाँ से अलकनंदा देवप्रयाग में जाकर भागीरथी से मिलती है तथा गंगा नदी का रूप ले लेती है .प्रसिद्ध धर्मस्थल केदारनाथ धाम रुद्रप्रयाग से मात्र 86 की.मी. दूर है . भगवान शिव के नाम पर रूद्रप्रयाग का नामकरण हुआ है. रूद्रप्रयाग श्रीनगर (गढ़वाल) से 34 किलोमीटर ऊपर स्थित है .

मंदाकिनी और अलखनंदा नदियों के संगम का नजारा बहुत ही अदभूत है .यह बहुत ही रमणीय स्थल है . इसकी सुन्दरता का वर्णन शब्दों में कर पाना संभव भी नहीं है . दोनों नदियाँ बहुत उचाई से बहते हुए जब रुद्रप्रयाग में मिलती है तो दोनों के मिलने से मधुर ध्वनी का गुंजायमान होता है . ऐसा माना जाता है कि यहां नारद मुनि ने भगवान शिव की उपासना की थी तब नारद जी को आर्शीवाद देने के लिए ही भगवान शिव ने रौद्र रूप में अवतार लिया था . रौद्र शब्द कालांतर में रूद्र हो गया
इन दिनों यहाँ कड़ाके की ठण्ड  है ,दिन तो जैसे तैसे कट जाता है लेकिन रात का तापमान काफी गिर कर १२ से. हो जाता है. सुबह  की ठण्ड का सामना  छत्तीसगढ़ जैसे गर्म इलाके के लोग  कैसे कर पाते होंगे आप अनुमान लगा सकते है .  

21 नवंबर, 2011

क्या बच पायेगा हिमालय का ग्लेशियर ?

ग्लेशियर बचाने भारत ,भूटान, नेपाल और बांग्लादेश का संयुक्त मोर्चा 
 एवरेस्ट 
वैज्ञानिक रूप से यह बात अब प्रमाणित हो चुकी है कि पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम चक्र में आश्चर्यजनक ढंग से आये परिवर्तन के कारण हिमालय का बर्फ तेजी से पिघल रहा है. इन क्षेत्रों में बरसात की प्रकृति बदल गई है और हिमालय के आस पास बढ़ता तापमान स्थानीय लोगों और वन्य जीवन पर असर डाल रहा है. हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले बुजुर्ग जलवायु परिवर्तन के साक्षात गवाह है . हिमालय के ग्लेशियर प्रकृति के धरोहर है ,यदि ये ग्लेशियर यूँ ही पिघलते रहे तो जन-जीवन पर व्यापक असर होगा .

भारत ,भूटान, नेपाल और बांग्लादेश ने संयुक्त रूप से इस गंभीर समस्या के निदान के लिए प्रयास शुरू किया है . चारों पड़ोसी देश ऊर्जा, पानी, खाद्य और जैव विविधता के मुद्दों पर सहयोग के लिए वचनबद्ध हो गए हैं. वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ.) के मुताबिक भूटान की राजधानी थिम्पू में समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. समझौते के तहत ऐसी योजनाएं बनाने पर सहमति बनी है जो जलवायु परिवर्तन के अनुरूप हिमालय को बचाने में मददगार हों.  "क्लाइमेट सम्मिट फॉर लिविंग हिमालयाज" के नाम से दो दिन तक चले सम्मेलन के बाद भारत, भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के बीच  समझौता हुआ ;चारोँ देशों में हिमालयी क्षेत्र में वन्य जीव संरक्षण को बढ़ावा देने, वनों को बचाने , खाद्य और पानी की आपूर्ति को बचाए रखने पर सहमति बनी है.

इस समझौते के तहत कार्य योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन  में यदि चारोँ देश गंभीरता से जुट गए तो हिमालय के ग्लेशियर को बचाने  कुछ हद तक कामयाबी मिल सकती है . यह प्रयास दुनिया के अन्य देशों के लिए भी मिशाल बनेगा .