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15 मार्च, 2011

मुख्यमंत्री ने किया भण्डार गृह निगम की वेबसाईट का लोकार्पण

मुख्यमंत्री डॉ.  रमन सिंह ने आज यहां विधानसभा स्थित अपने कार्यालय कक्ष में छत्तीसगढ़ राज्य भण्डार गृह निगम की नव-निर्मित वेबसाईट का लोकार्पण किया। निगम अध्यक्ष श्री अशोक बजाज ने मुख्यमंत्री को वेबसाईट की विशेषताओं के बारे में बताया। गृह मंत्री श्री ननकीराम कंवर, संसदीय कार्य मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री रामविचार नेताम सहित भण्डार गृह निगम मुख्यालय के अधिकारी इस अवसर पर उपस्थित थे।

 उल्लेखनीय है कि राज्य निर्माण के बाद निगम ने पहली बार अपनी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार के लिए वेबसाईट की शुरूआत की है।कोई भी व्यक्ति कहीं से भी इन्टरनेट पर वेबसाईट डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट सी जी एस डब्ल्यू सी डॉट सी जी डॉट जी ओ व्ही डॉट इन(www.cgswc.cg.gov.in) पर क्लिक करके इस वेबसाईट का अवलोकन कर सकता है। मुख्यमंत्री ने भण्डार गृह निगम में सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित इस महत्वपूर्ण संचार माध्यम के उपयोग पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अनाजों के सुरक्षित भण्डारण में भण्डार गृह निगम की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने निगम अध्यक्ष श्री अशोक बजाज की इस पहल को निगम के काम-काज में पारदर्शिता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया और उम्मीद जताई कि इससे आम जनता को भण्डार गृह निगम के कार्यों की पूरी जानकारी आसानी से ऑन लाईन मिल सकेगी। उन्होंने वेबसाईट के शुभारंभ पर निगम अध्यक्ष श्री बजाज सहित निगम के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बधाई दी।

निगम अध्यक्ष श्री अशोक बजाज ने मुख्यमंत्री को बताया कि वेबसाईट में निगम के सेटअप, अधिकारियों की सूची और राज्य में स्थित निगम की समस्त शाखाओं की सूची आम जनता की जानकारी के लिए प्रदर्शित कर दी गयी है। इसके अलावा निगम की नियमावली और संबंधित सभी अधिनियमों के साथ-साथ निगम के बजट, भण्डार शुल्क और भण्डारण शर्तों की जानकारी, गोदाम निर्माण संबंधी जानकारी निगम द्वारा संचालित गोदामों के फोटोग्राफ्स तथा वार्षिक प्रतिवेदन सहित संचालक मंडल तथा कार्यकारिणी सदस्यों की सूची भी इसमें शामिल की गयी है।



14 मार्च, 2011

टच खत्म, टचलेस का जमाना

 डायचे वेले हिंदी ने आज एक नई तकनीक की जानकारी दी है जो ब्लॉग प्रेमियों के लिए खुशखबरी से कम नहीं है.  संवाददाता श्री विवेक कुमार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि यह कल्पना से भी थोड़ी आगे की बात है. हालांकि यह कल्पना नहीं, सच है. अब सब मशीनें बिना छुए ही काम करेंगी. बिल्कुल सही. आपका कंप्यूटर, मोबाइल फोन, वॉशिंग मशीन, टीवी...सब कुछ बिना छुए चलेगा.

आपके सामने कंप्यूटर पर कई वेबसाइट्स खुली हैं. आपको हर वेबसाइट पर बार बार जाना पड़ता है. लेकिन ऐसा करने के लिए अब आपको बार बार क्लिक करने की जरूरत नहीं. बस जिस वेबसाइट का पेज खोलना है, उसकी ओर देखिए और पेज खुल जाएगा. क्योंकि यह कंप्यूटर आंखों से चलता है. स्वीडन की कंपनी टॉबी टेक्नॉलजी के निकोलस पेट्रोसा इस कंप्यूटर को लेकर सेबिट आए हैं. वह बताते हैं, "हमारी टेक्नॉलजी इन्फ्रारेड इल्यूमिनेटर पर निर्भर है जो चेहरे पर इन्फ्रारेड तरंगें छोड़ती है. इससे यूजर की तस्वीर बन जाती है. कंप्यूटर आंख को पहचानता है और स्क्रीन पर आपकी नजर कहां है इसका पता लगाता है. तब आप इंटरेक्शन के जरिए कंप्यूटर पर काम कर सकते हैं."

 इस वक्त बाजार में टच स्क्रीन तकनीक की धूम है. स्क्रीन को उंगली से छूने भर से काम करना अद्भुत अनुभव है. लेकिन यह तकनीक पुरानी हो गई है. अब वक्त है टचलेस तकनीक का. यानी स्क्रीन को छुए बिना ही काम होगा. यूं समझ लीजिए की आप किसी जादूगर की तरह अपने फोन की स्क्रीन पर उंगली घुमाएंगे और काम हो जाएगा. इसके लिए विशेष सेंसरों का इस्तेमाल होता है. फ्रांस की कंपनी फोरगैलनोटेक के सेल्स मैनेजर विलियम बेकेरीन बताते हैं, "हमने नए थ्रीडी स्मार्टफोन और स्क्रीन के सेंसरों में नया आयाम जोड़ा है. ये सेंसर स्क्रीन के ऊपर से ही उंगली को पहचान जाते हैं. मतलब फोन उंगली की स्थिति का सही सही पता लगा लेगा. थ्रीडी फोन के आने से और मौजूदा सिस्टम में भी फोन अपने आप ये बात समझ जाएगा कि उंगली फोन को या किसी भी स्क्रीन को कहां छूना चाहती है."

लेकिन बात यहीं नहीं थमती. आप स्क्रीन के अंदर तक जा सकते हैं. आपकी उंगली विडियो के अंदर किरदारों के भीतर तक जा सकती है. और फोन के मामले में तो यह बहुत जल्दी हो जाएगा. एलजी कंपनी अपना थ्रीडी फोन बाजार में उतार रही है. कंपनी के डोमिनिक प्रेसोस्की बताते हैं, "यह सामान्य स्मार्ट फोन जैसा लगता है जिसका ग्लास फ्रंट वैसा ही है. इसमें बटन हैं. इसमें जो चीज बाकी फोन से अलग है वह इसके पीछे लगा डबल लेंस है. आप इसमें थ्रीडी कंटेंट देख सकते हैं. आप इससे थ्रीडी फोटो विडियो बना पाएंगे. और सामान्य फोन का काम तो इससे ले ही पाएंगे. और इसके लिए किसी चश्मे की भी जरूरत नहीं है .

इस तकनीक का एक अद्भुत आयाम पढ़ने के मामले में सामने आ रहा है. जर्मनी के रिसर्च सेंटर फॉर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है जो आपको पढ़ने में मदद करेगा. होले क्रिस्टानियन इस बारे में सही से समझा सकते हैं, "हमारे पास एक आईट्रैकर टेक्नॉलाजी है जिसके जरिए कंप्यूटर आंख की गति और दिशा का पता लगाता है. मसलन अगर आप पढ़ते वक्त किसी शब्द पर ज्यादा देर अटक जाते हैं तो कंप्यूटर समझ जाएगा कि इस शब्द में आपको दिक्कत है. तब फौरन वह उस शब्द का मतलब और उससे जुड़ी सारी जानकारी आपके सामने पेश कर देगा."

अब जब सारा काम बिना छुए ही हो रहा है तो क्या कंप्यूटर टाइपिंग के लिए उतना बड़ा डिब्बा सामने रखना सही होगा? नई तकनीक कहती है... नहीं. दक्षिण कोरिया की एक कंपनी ने वर्चुअल की बोर्ड बनाया है. मतलब कीबोर्ड जैसी कोई चीज है ही नहीं. बस एक छोटी सी डिब्बी है. डिब्बी निकाली, इसे तार से जोड़ा और आपने सामने मेज पर कुछ तरंगें बिछ जाएंगी जो कीबोर्ड की शक्ल में होंगी. कंपनी के अधिकारी क्रिस इसे बेहतर समझा पाएंगे, "यह एक ब्लू टुथ प्रॉडक्ट है. इसमें कीबोर्ड और माउस एक ही डिवाइस में है. इस डिवाइस के नीचे से इन्फ्रारेड लाइट निकलती है जिसे हम आंख से नहीं देख सकते. लेकिन कैमरा उसे देख लेता है. इसलिए जब आप किसी की को दबाते हैं तो लाइट की तरंग टूट जाती है. कैमर उस टूट को पहचान लेता है और उसे डेटा में तबदील कर देता है."

जब बिना छुए ही सब काम हो जाएगा तो हमारी जो ऊर्जा बचेगी, उसका क्या करेंगे? फिर तो दुनिया में गति ही नहीं रहेगी. आईबीएम एक इंजीनियर ने इस सवाल का बड़ा अच्छा जवाब दिया कि इंसान को समझाइए कि इस ऊर्जा का इस्तेमाल प्यार बांटने में लगाए.

13 मार्च, 2011

खतरनाक है अगरबत्ती की खुशबू


चंदन, केवड़ा, गुलाब,चंपा,चमेली औऱ तमाम दूसरी तरह के खुशबू अपने धुएं में समेटे जलने वाली अगरबत्ती खतरनाक भी हो सकती है. थाईलैंड के स्वास्थ्य मंत्रालय ने तो बकायदा इसे जलाने के नए नियम कायदे बना दिए हैं.

भारत के मंदिरों की तरह ही थाइलैंड में भी देवी देवताओं को खुश करने के लिए अगरबत्ती जलाने का रिवाज है. यहां के बौद्ध मंदिरों में खूब अगरबत्ती जलाई जाती है. अगरबत्ती का धुआं माहौल में खुशबू और प्रार्थनाओं में आध्यात्मिक भावना जगाती है पर ये खतरनाक भी हो सकता है.

 आमतौर पर अगरबत्तियों को बनाने का काम छोटे स्तर पर और घरेलू उद्योग के रूप में होता है. इनमें कई तरह के तेल, रसायन, लकड़ी और दूसरी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है. थाईलैंड के स्वास्थ्य मंत्री जुरीन लक्सनाविजित की तरफ से जारी बयान में कहा गया है अगरबत्तियों में बेंजीन, ब्यूटाडाइन और बेन्जो पाइरेन की खतरनाक मात्रा होती है. स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक इन रसायनों की वजह से ल्यूकेमिया और फेफड़ों, त्वचा,ब्लाडर का कैंसर हो सकता है.

मंत्रालय ने मंदिरों को ऐसी जगहों पर जहां से हवा के गुजरने का पुख्ता इंतजाम न हो अगरबत्तियों को जलाना बंद करने के निर्देश दिए हैं. इसके साथ ही मंदिर कर्मचारियों को अगरबत्तियां जलाने के बाद अपने हाथों और चेहरे को अच्छी तरह से धोने के लिए कहा गया है. इसके साथ
ही मंदिर कर्मचारियों का हर साल स्वास्थ्य परीक्षण कराने की भी बात कही गई.

हम सुगंधों को जितना जानते हैं, उनसे किसी खतरे का गुमान नहीं होता। इत्र-फुलेल और विदेशी सेंटों के रूप में मिलने वाली सुगंधों से लोगों की सुरुचि का ही अहसास होता है। पर इधर सुगंधों से खतरे की बू आने लगी है।


ये सुगंधें सिर्फ इत्र या सेंट की शीशियों में नहीं हैं, ये हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में काम आने वाली तमाम चीजों में समाई हैं। जैसे कि डियो, कपड़े धोने के साबुन, एयर फ्रेशनर, मॉस्किटो रिपलेंट या खुशबूदार पेन-पेंसिल-कागज़ वगैरह। कुछ अरसा पहले तक घरेलू उपयोग की इन चीज़ों में अलग से कोई सुगंध नहीं डाली जाती थी। पर अब कुछ डिटर्जन्ट, साबुन वगैरह में भी अपनी खास सुगंध होती है। यह मनमोहक महक ज़ाहिर है, उन उत्पादों को इस्तेमाल करने वालों को अच्छी लगती है, जब तक कि उन्हें उससे कोई एलर्जी न हो। पर साइंटिस्टों ने ऐसी सुगंधों को खतरनाक पाया है। यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन के विज्ञानियों ने एक व्यापक शोध में पर्सनल केयर प्रॉडक्ट्स, एयर फ्रेशनर्स और लॉन्ड्री प्रॉडक्ट्स के सुगंधित बनाए गए विभिन्न ब्रैंड्स को विषैला और इंसानों की सेहत के लिए खतरनाक माना है। खतरे की वजह इन प्रॉडक्ट्स में सुगंध पैदा करने के लिए इनमें मिलाए गए वे रसायन हैं, जो पहले नहीं इस्तेमाल होते थे- एसिटोन, लाइमोनेन, एसिटिल्डिहाइड और 1,4-डायऑक्सेन आदि जैसे रसायन खुशबू पैदा करते हैं।


हालांकि शोध में इन रसायनों की वजह से सेहत पर पड़ने वाले असर का अध्ययन नहीं किया गया है, पर कुछ दूसरी रिसर्च से पता लगता है कि खुशबूदार उत्पादों का इस्तेमाल करने वाले बहुत से लोग कुछ विशेष किस्म की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की शिकायत करने लगे हैं। इन परेशानियों की वजह जानना मुश्किल नहीं है। साबुन, डिटर्जन्ट या मच्छर भगाने वाले लिक्विड में पहले से ही तमाम केमिकल होते हैं और उनके खुशबूरहित ब्रैंड्स के इस्तेमाल से भी एलर्जी से लेकर दमा, कैंसर जैसी बीमारियों और न्यूरोलॉजिकल व जिनेटिक विकृतियों तक की आशंका होती है।


जब खुशबू पैदा करने के लिए इन उत्पादों में प्राकृतिक सुगंधों की जगह दूसरे केमिकल मिलाए जाते हैं, तो बीमारियों का खतरा भी और बढ़ जाता है। ऐसे में साइंटिस्टों की सलाह है कि किसी खुशबूदार प्रॉडक्ट की जगह अपनी स्वाभाविक गंध वाले उत्पाद ही खरीदें और जहां तक कमरे को महकाने वाले एयर फ्रेशनर की बात है, तो उसकी खुशबू के मुकाबले कमरे में आती स्वच्छ हवा ज़्यादा बेहतर है, क्योंकि उससे सेहत की सुगंध आती है।


अगरबत्ती हो चाहे कोई भी इत्र उसकी खुशबू प्राणलेवा है .मुझे  स्वयं इससे भारी  एलर्जी है .आप भी इससे बचें तथा दूसरों को भी इससे बचने की सलाह दें .DW NEWS

12 मार्च, 2011

जापान में सुनामी: हर तरफ़ तबाही का मंज़र





        जापान के इतिहास में सबसे भयंकर भूकंप और इसके बाद आए सूनामी ने देश के एक बड़े हिस्सा का नक्शा बदल कर रख दिया. 10 मीटर विशाल लहरों ने सैकड़ों लोगों का जीवन लील लिया और रास्ते में जो कुछ भी आया, उसे नष्ट कर दिया .
        हजारों कारें, जहाजें, ट्रेनें, बसें और इमारतें पानी के आगे रेत साबित हुईं और सूनामी की लहरों में बह गईं. स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में स्थित रेड क्रॉस का कहना है कि सूनामी की लहरें इतनी ऊंची थीं, जितनी पहले कभी नहीं दिखीं. इसके बाद पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में सूनामी की चेतावनी जारी कर दी गई.

वेबसाइटों पर मदद की गुहार ....

जापान में आए भूकंप और सुनामी में सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट काफ़ी कारगर साबित हो रहे हैं.

शुक्रवार को गूगल वेबसाइट ने दिनभर एक चेतावनी संदेश अपने मुखपृष्ठ पर रखा और अब राहत और बचाव में भी इन वेबसाइटों से मदद मिल रही है.बीबीसी के मार्क लोबेल ने इस संकट की घड़ी में एक ऐसी ही वेबसाइट पर नज़र डाली तो पाया कि लोग इन पर मदद की गुहार लगा रहे हैं क्योंकि आमतौर पर चुस्त टेलीफ़ोन सेवाएं ठप्प पड़ गई हैं.जापान के मुख्य व्यावसायिक टीवी चैनलों में से एक की लाइव स्ट्रीमिंग वेबसाइट पर एक चैटबोर्ड खुला हुआ है जिसपर हर दूसरे सेकंड में कोई न कोई संदेश आ रहा है.जापान में शनिवार की सुबह के तीन बजे हैं जब एक संदेश आता है: “कृपया मेरी मदद करो. कृपया आपात सेवाओं को ख़बर करो. मेरा भाई फंसा हुआ है. 421-2 कोयोबाई इज़ूमिकू, सेनदाइशा.”

मदद की ये करूण गुहार स्क्रीन पर लगभग एक मिनट तक रहती है. नए संदेश जल्द ही उसे पीछे ढकेल देते हैं.लेकिन ठीक सात मिनट बात एक और संदेश आता है: “421-2 में रहने वाले व्यक्ति को सुरक्षित निकाल लिया गया है.”तभी एक और संदेश आता है जिसमें कोई लोगों से बिजली की तारों को नहीं छूने की सलाह देता है और फिर कोई दूसरा सुनामी से प्रभावित लोगों के लिए दुआ करता है.

और फिर एक और संदेश: “मेरे दोस्त की पत्नी और बच्चा वाकाबायाशिकू में हैं और हम उनसे संपर्क नहीं कर पा रहे. कृपया मुझे उस इलाके के बारे में कोई ख़बर दें.”

और पांच मिनट बाद एक और संदेश आता है: “मेरी मां और मेरा कुत्ता चार बजे तक घर में थे. पता है नंबर 2 मिनातोमाची, इशीमाकिशी, किबा. तब ग्राउंड फ़्लोर में पानी भर चुका था और अब मैं उनसे बिल्कुल ही संपर्क नहीं कर पा रहा हूं. कृप्या उन्हें बचाओ.”

इसके पहले जब पानी का स्तर बढ़ रहा था तब आ रहे संदेशों में भी लोगों की आशंकाएं थीं, डर था और सोशल मीडिया एकमात्र साधन था अपना संदेश बाहर पहुंचाने का.

लेकिन इस संकट के विकराल होते रूप के साथ अब संदेश बाहर पहुंचाना जितनी बड़ी चुनौती है उतनी बड़ी ही चुनौती इस बात की है कि कोई उसे पढ़ सके क्योंकि हर पल संदेश बढ़ते जा रहे हैं. हर दूसरे सेकंड कोई न कोई संदेश आ ही रहा है.
गूगल से प्राप्त तस्वीरें .....

देखिये   अखबार .........


हिंदी दैनिक "  नवभारत " रायपुर का मुखपृष्ठ दिनांक 12/03/2011
हिंदी दैनिक "  हरिभूमि " रायपुर का मुखपृष्ठ दिनांक 12/03/2011



इस भीषण त्रासदी के शिकार सभी जापानी भाइयों-बहनों  के प्रति गहरी संवेदना प्रगट करते हुए प्रार्थना  करता हूँ कि  ईश्वर उनके परिजनों को इस प्रलय-बेला  से उबरने की शक्ति दे .