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31 जुलाई, 2010

राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन की जयंती पर विशेष

हिंदी के परम पक्षधर को नमन...

राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन जी 
राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन भारत के महान स्वतन्त्रता सेनानी थे। उनका जन्म 1 अगस्त 1882 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद मे हुआ। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन अपने उदार चरित्र और सादगीपूर्ण जीवन के लिए विख्यात थे तथा हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलवाने में उनकी भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। सामाजिक जीवन में टंडन के महत्वपूर्ण योगदान के कारण सन १९६१ में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" से सम्मानित किया गया। टंडन के व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष उनका विधायी जीवन था, जिसमें वह आज़ादी के पूर्व एक दशक से अधिक समय तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे। वे संविधान सभा,लोकसभा और राज्यसभा के भी सदस्य रहे। वे समर्पित राजनयिक, हिन्दी के अनन्य सेवक, कर्मठ पत्रकार, तेजस्वी वक्ता और समाज सुधारक भी थे।  
                                                        
सन 1950 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्हें भारत के राजनैतिक और सामाजिक जीवन में नयी चेतना एवं नयी क्रान्ति पैदा करने वाले कर्मयोगी के रूप में जाना जाता है ।वे जन सामान्य में राजर्षि ( जो ऋषि के समान सत्कार्य में लगा हुआ हो) के नाम से प्रसिद्ध हुए। टण्डन जी का राजनीति में प्रवेश हिन्दी प्रेम के कारण हुआ। वे हिन्दी को देश की आजादी के पहले "आजादी प्राप्त करने का" और आजादी के बाद "आजादी को बनाये रखने का" साधन मानते थे। वे महात्मा गांधी के अनुयायी होने के बावजूद हिंदी के मामले में उन के विचारों से सहमत नहीं हुए। महात्मा गांधी और नेहरू राष्ट्रभाषा के नाम पर हिंदी-उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी भाषा के पक्षधर थे, जिसे देवनागरी और फारसी दोनों लिपि में लिखा जा सके, लेकिन टंडन इस मामले में हिंदी और देवनागरी लिपि का समर्थन करते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में कामयाब रहे । मातृभाषा हिंदी के इस परम पक्षधर को उनकी जयन्ती पर श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ।

डाक टिकट भारत रत्न
डाक टिकट
                                                           

30 जुलाई, 2010

यथार्थवादी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द

मुंशी प्रेमचन्द जयन्ती पर विशेष

            मुंशी प्रेमचन्द एक अच्छे साहित्यकार थे उन्होनें हिन्दी,अंग्रेजी एवं उर्दू तीनों भाषाओँ में अच्छी रचनाएं प्रस्तुत की। उन्होंने अपनी रचनाओं में गरीबों के दुख-दर्द को साहित्य के माध्यम से दर्शाकर समाज को दिशा देने की कोशिश की थी। यथार्थवादी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक विषमताओं को प्रतिपादित किया। देखा जाए तो भारतीय साहित्य का बहुत सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा वह चाहे दलित साहित्य हो या नारी साहित्य उसकी जड़ें गहराई तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई देती हैं. हमें प्रेमचंद साहित्य में समाज के कुचले,पिसे और हमेशा दुख का बोझ सहने वाले पात्र नजर आते है. प्रेमचंद के साहित्य में पहली बार किसान मिलता है. भारतीय किसान, जो खेत के मेंड़ पर खड़ा हुआ है, उसके हाथ में कुदाल है और वह पानी से सिंचाई कर रहा है. चाहे तपती दोपहरी हो या कड़कड़ाती ठण्ड या चाहे सावन की झड़ी वह मेहनत करता है और कर्ज़ उतारने की कोशिश करता है.

मैंने बहुत पहले मुंशी प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कृति गोदान पढ़ी थी, गोदान का नायक होरी एक किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है। 'आजीवन संघर्ष के वावजूद उसकी एक गाय की आकांक्षा पूर्ण नहीं हो पाती'। गोदान देश के किसान के जीवन की दशा का प्रतिबिम्ब है। 'गोदान' होरी की कहानी है, उस होरी की जो जीवन भर मेहनत करता है, अनेक कष्ट सहता है, केवल इसलिए कि उसकी मर्यादा की रक्षा हो सके और इसीलिए वह दूसरों को प्रसन्न रखने का प्रयास करता रहता है, किंतु उसे इसका फल नहीं मिलता. अंत में उसे मजबूर होना पड़ता है, फिर भी वह अपनी मर्यादा नहीं बचा पाता। परिणामतः वह जप-तप के अपने जीवन को ही होम कर देता है। यह होरी की कहानी नहीं, उस काल के हर भारतीय किसान की आत्मकथा है। 

उनकी जयंती पर गोदान के कुछ डायलोग प्रस्तुत है -

*    आदमी का बहुत सीधा होना भी बहुत बुरा होता हैं । उसके सीधेपन का फल यह होता हैं कि कुत्ते भी मुंह चाटने लगते हैं ।

  सुख  के दिन आये तो लड़ लेना, दुख के दिन तो साथ रोने से ही कटते हैं।

*   कुत्ता हड्डी की रखवाली करे तो खाय क्या ?

*   उदासी में मौत की याद तुरंत आ जाती हैं ।

*   मैं अपनो को भी अपना नही बना सकती, वह दूसरो को भी अपना बना लेती है।

*   परदेश में भी संगी साथी निकल ही आते हैं , अम्मां और यह तो स्वारथ का संसार हैं । जिसके साथ चार पैसे गम खावो वही अपना है, खाली हांथ तो मां बाप भी नही पूछते ।

*   क्या तुम इतना भी नही जानते कि नारी परीक्षा नही चाहती , प्रेम चाहती हैं । परीक्षा गुणो को अवगुण , सुन्दर को असुन्दर बनाने वाली चीज हैं , प्रेम अवगुणो को गुण बनाता हैं , असुन्दर को सुन्दर ।

  मनुष्य आप ही अपना मित्र और शत्रु हैं । जिसने विवेक से अपना मन स्वाधीन कर लिया हैं वह स्वयं ही अपना हितकारी हैं और जिसने विवेक का परित्याग कर दिया हैं , वह स्वयं ही अपना शत्रु हैं ।

  मन को जितने वाले शांत  स्वभाव मनुष्य की आत्मा शीत-उष्ण , सुख-दुख , मान और सम्मान इनके होने पर भी अत्यंत स्थिर रहती हैं ।

*  स्त्री का अपने पति पर हावी होना उतना ही कष्टदायी हैं जितना की उसका वाचाल और कुलटा होना ।

छत्तीसगढ़ में राम

29 जुलाई, 2010

विचार तत्व

1.  हताश न होना सफलता का मूल है और यही परम सुख है। उत्साह मनुष्य को कर्मो में प्रेरित करता है और उत्साह ही कर्म को सफल बनता है।
                                                                                                           - वाल्मीकि
2.  मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप को सदाचार से लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है।                                                                                                                           - गौतम बुद्ध
3.  प्रजा के सुख में ही राजा का सुख और प्रजाओं के हित में ही राजा को अपना हित समझना चाहिए।    आत्मप्रियता में राजा का हित नहीं है, प्रजाओं की प्रियता में ही राजा का हित है ।
                                                                                                              - चाणक्य
  4.  अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मजबूति से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट  उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है।
                                                                                        - आचार्य श्रीराम शर्मा
  5.  देवमानव वे हैं, जो आदर्शों के क्रियान्वयन की योजना बनाते और सुविधा की ललक-लिप्सा को अस्वीकार करके युगधर्म के निर्वाह की काँटों भरी राह पर एकाकी चल पड़ते हैं।
                                                                                        - आचार्य श्रीराम शर्मा