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10 नवंबर 2025

छत्तीसगढ़ राज्य का गठन सहकारिता के लिए बना वरदान

 राज्य स्थापना के रजत जयंती पर विशेष आलेख

    
त्मनिर्भर भारत के लिए सहकारिता सबसे महत्वपूर्ण विधा है। इसके माध्यम से समाज के कमजोर वर्ग के लोगों का आर्थिक उत्थान होता है। सहकारिता से जुड़ कर लोग सामूहिक प्रयास एवं परस्पर सह‌योग से अपनी आर्थिक गतिविधियों का संचालन करते हैं तथा उचित लाभार्जन करते हैं। ग्रामीण भारत के लिए सह‌कारिता वरदान से कम नहीं है। सह‌कारिता के माध्यम से ना केवल वित्तीय प्रबन्धन बल्कि उत्पादन, उत्खनन, प्रसंस्करण, परिवहन एवं विपणन के कार्य भली भांति संपादित हो रहे हैं। सहकारी समितियाँ अपने सदस्यों को किफायती एवं प्रमाणित वस्तुयें उपलब्ध कराती है। सहकारी संगठनों एवं संस्थाओं  के कार्यों में पूरी तरह पारदर्शिता होती है। सहकारी संस्थायें रोजगार सृजन भी करती है। छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसानों के उत्थान के लिए सहकारी संस्थाओं की उप‌योगिता काफी महत्वपूर्ण है।

छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के पूर्व यानी सन् 2000 से पूर्व अविभाजित मध्यप्रदेश का यह भू-भाग आर्थिक रूप से पिछड़ा माना जाता था। लगातार अकाल व दुर्भिक्ष के कारण लाखों परिवारों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती थी । फलस्वरूप हर साल पलायन की स्थिति निर्मित होती थी । छत्तीसगढ़ में सहकारी क्षेत्र भी उस दौर में उपेक्षित था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी की दृढ़ इच्छा शक्ति का परिणाम है कि वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया। उसके बाद ही कृषि एवं सहकारी क्षेत्र के नए दौर की शुरुवात हुई l जबकि राज्य गठन के समय छत्तीसगढ़ में सहकारी आंदोलन की स्थिति बहुत ही कमजोर थी । सहकारी संस्थायें एवं सहकारी समितियां बीमारू हालत में थी। अनुसूचित क्षेत्र की अधिकांश सहकारी समितियाँ एन.पी.ए. बढ़ने के कारण कालातीत (डिफाल्टर) हो चुकी थी । उस वक्त सहकारी आदोलन के प्रति लोगों की रूचि कम हो चुकी थी. 
छत्तीसगढ़ महतारी
छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के समय कृषि वित्त के क्षेत्र में एक शीर्ष बैंक के अलावा 7 केन्द्रीय बैंक थे जो कि 1333 सहकारी समितियों (पैक्स एवं लैम्प) के माध्यम से वित्त पोषण करते थे । समूचे छतीसगढ़ में सहकारी बैंकों की मात्र 213 शाखायें थी जो बढ़कर अब 345 हो गई है । यह सन् 2003 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद कृषि सहकारिता के उन्नयन के लिए गंभीरता से हुये प्रयास का परिणाम है । इसी प्रकार लगातार  सुविधाओं व सेवाओं का विस्तार हुआ जिससे लघु व सीमांत कृषक भी सहकारी संस्थाओं की तरफ आकर्षित हुये । यहाँ पर यह उल्लेख करना लाजिमी होगा की राज्य गठन के प्रथम तीन वर्ष में केन्द्रीय सहकारी बैंक रायगढ़ के डिफाल्टर हो जाने से रिजर्व बैंक ने उसका लाइसेंस निरस्त कर दिया । फलस्वरूप राज्य में केन्द्रीय सहकारी बैंकों की संख्या 7 से घट कर 6 हो गई । यह सहकारी आंदोलन से  जुड़े लोगों के लिए बहुत बड़ा सदमा था । अविभाजित मध्यप्रदेश में सहकारी आन्दोलन को एक बड़ा झटका पहले भी लग चुका था जब दिग्विजय सिंह सरकार ने पी.डी.एस. का काम सहकारी समितियों से छीन कर निजी हाथों में सौंप दिया था, जिससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ गरीबों को सही रूप से नहीं मिल रहा था l डॉ रमन सिंह सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत खाद्यान्न एवं अन्य वस्तुओं के वितरण का काम सहकारी समितियो को पुनः सौंपा । जिससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली दुरुस्त हुई साथ ही साथ आम लोगों की सहकारी समितियों के वितरण केन्द्र में आवाजाही शुरु हुई। डॉ. रमन सरकार ने सहकारी संस्थाओं के उन्नयन के लिए केन्द्र सरकार द्वारा बनाई गई प्रो. वैद्यनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू किया। सितम्बर 2007 में राज्य सरकार, नाबार्ड एवं क्रियान्वयन एजेन्सियों के मध्य एम.ओ.यू. हुआ। इसके तहत सह‌कारी समितियों को कुल 225 करोड रुपये की सहायता राशि प्रदान की गई जिससे मृतप्राय सहकारी समितियों को जीवन दान मिल गया।

किसानों के बारे में कहा जाता है कि किसान ऋण में पैदा होता है, ऋण लेकर जीता है तथा ऋण छोड़कर मर जाता है। इसकी मूल वजह यह थी कि कृषि ऋण पर भारी भरकम ब्याज वसूला जाता था। साहूकारी प्रथा के समय तीन प्रतिशत मासिक यानी 36 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर भी मुश्किल से ऋण उपलब्ध हो पाता था। खेती कोई इतना लाभकारी धंधा तो था नहीं कि इतना भारी-भरकम ब्याज लोग अदा कर सके । अत: किसान कर्ज के बोझ तले साहूकारों की गुलामी करने पर मजबूर हो जाते थे। कालांतर में सहकारी आंदोलन का विस्तार हुआ। किसानों की वित्तीय आवश्यकताओं की आपूर्ति एवं किफायती दर पर खाद-बीज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों का गठन हुआ। जिसे सामान्य क्षेत्र में पैक्स तथा अनुसूचित क्षेत्र में लैम्स कहा जाता है। सहकारी समितियां अपने सदस्य कृषकों को ऋण सुविधा प्रदान कराने लगी परन्तु इस पर ब्याज दर 16 प्रतिशत से कम नहीं था। समितियां भी समय सीमा पर ऋण अदायगी नहीं करने वाले सदस्यों से चक्रवृद्धि ब्याज वसूल कर रही थी। समय पर किसानों द्वारा ऋण अदा ना करने के अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन उसमें से एक प्रमुख कारण मौसम की अनिश्चिता भी है । चाहे अतिवृष्टि हो, चाहे अनावृर्ष्टि अथवा समय पर वृष्टि ना हो तो कृषि-उत्पाद पर प्रतिकूल असर पड़ता ही है, फसल खराब होने के बाद किसान ऋण अदा करने में अक्षम हो जाते है। ऐसे किसान समितियों के डिफाल्फर की श्रेणी में आ जाते हैं । इनकी कृषि भूमि नीलाम हो जाती है। डॉ. रमन सरकार ने किसानों की इस दशा पर चिन्ता करते हुये कृषि ऋण पर ब्याज दर शून्य प्रतिशत कर दिया, जो किसानों के लिए वरदान सिद्ध हुआl  यानी किसानों को अब केवल मूलधन ही अदा करना होता है, ब्याज की राशि समितियों को ब्याज अनुदान के रुप में सरकार अदा करती है। साल दर साल अकाल से जुझ रहे किसानों के लिए यह बहुत ही राहत भरा फैसला था। इसका परिणाम यह हुआ कि छत्तीसगढ़ निर्माण के प्रथम वर्ष में सहकारी संस्थाओं के माध्यम से 152 करोड़ रूपये का कृषि ऋण वितरित किया था जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर लगभग 6800  करोड़ रूपये तक पहुँच गया है l ऋण लेने वाले किसानों की संख्या भी 4 लाख से बढ़कर साढ़े पंद्रह लाख हो गई है l  इस बीच राष्ट्रीय फमल बीमा योजना लागू हुई, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में किसानों के लिए आर्थिक रक्षा कवच बन गई है। डॉ. रमन सरकार ने छत्तीसगढ़ में कृषि के मानसून पर निर्भरता को कम करने के लिए एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया उन्होंने सिंचाई की सुविधा बढ़ाई । जल श्रोतों की उपलब्धता के आधार पर नाला बंधान, चेक डैम एवं एनीकट का निर्माण किया जिससे छत्तीसगढ़ में सिंचित रकबा में अप्रत्याशित बढ़ौतरी हुई। इसके अलावा शाकम्भरी योजना, किसान समृ‌द्धि योजना एवं सौर सुजला योजना लागू किया । इससे किसान सिंचाई जल के मामले में आत्मनिर्भर होने लगे। फलस्वरूप कृषि उत्पाद में अपेक्षाकृत बढ़ौतरी हुई, साथ ही साथ किसानों की आय भी बढ़ने लगी।

छत्तीसगढ़ में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी सहकारी समितियों के माध्यम से होती है। छत्तीसगढ राज्य निर्माण के प्रथम वर्ष सन् 2000-2001 में न्यूनतम् समर्थन मूल्य पर मात्र 4.63 लाख मेट्रिक टन धान की खरीदी की गई थी । जो 2024-25 में बढ़कर लगभग 150 लाख मेट्रिक टन हो गई है। वर्तमान में 2058 सहकारी समितियां द्वारा 2739 उपार्जन केन्द्रों के माध्यम से धान खरीदी की व्यवस्था की गई है। सभी उपार्जन केंद्रों में धान की खरीदी एवं भुगतान की व्यवस्था ऑनलाइन है । सभी समितियों में माइक्रो ए.टी.एम. की भी व्यवस्था की गई है तथा किसानों को रुपे के.सी.सी. कार्ड भी उपलब्ध कराया गया है । इसीलिए छत्तीसगढ़ की धान खरीदी व्यवस्था को पूरे देश में एक आदर्श व्यवस्था के रूप में माना जाता है.

केन्द्र की मोदी सरकार भी सहकारी आन्दोलन के लिए प्रति काफी गंभीर है। इसीलिए केन्द्र में सहकारिता मंत्रालय की स्थाप‌ना कर कद्दावर मंत्री श्री अमित शाह जी को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। श्री शाह दृढ़ निश्चयी है तथा इरादे के पक्के हैं, सह‌कारिता के क्षेत्र में नई सोच के साथ नित्य नये कदम उठा रहें है। पैक्स के लिए आदर्श बायलॉज एवं सहकारी समितियों के विस्तार की उनकी योजना का लाभ देश के साथ साथ छत्तीसगढ़ को भी मिल रहा है । प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की कल्पना के अनुरूप किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय जी सहकारी आन्दोलन को लगातार गति प्रदान कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद 25 वर्षों का सफर सहकारिता के क्षेत्र में काफी उत्साह जनक रहा है । फलस्वरूप छत्तीसगढ़ की सह‌कारिता आज ऐसे मुकाम तक पहुंच गई है जिसे देखकर विकसित राज्य भी आश्चर्य करते है। परन्तु सहकारिता को परस्पर सहयोग एवं समन्वय के साथ आगे और भी लम्बा सफर तय करना है.

छत्तीसगढ़ निर्माण के रजत जयंती वर्ष में यह उम्मीद जागी है  कि मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय जी कृषि सह‌कारिता के विकास तथा सहकारी आन्दोलन के विस्तार के लिए अपने इरादें और संकल्प के अनुरूप नई आधारशीला रखेंगे.

रायपुर 01/11/2025                                                                                      अशोक बजाज

14 जुलाई 2025

मोदी-शाह की जोड़ी ने साकार किया डा. श्यामप्रसाद मुखर्जी का अखंड सपना

 डा. श्यामप्रसाद मुखर्जी की जयंती पर विशेष आलेख       

ज़ादी के साथ कश्मीर समस्या हमें विरासत में मिली थी जो भारत के लिए नासूर बन गई थी. आज़ादी के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में  बनी सरकार ने तुष्टीकरण की नीति के चलते जम्मू-कश्मीर में संविधान की धारा 370 लगा कर उसे विशेष दर्जा प्रदान कर दिया था. धारा 370 भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद है, जिसके चलते जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार मिल गया था. भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 का अनुच्छेद 370 तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था. धारा 370 के प्रावधानों के मुताबिक राज्य में संसद को रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का तो अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की सहमति लेनी होती है. इसी विशेष दर्जे के चलते जम्मू-कश्मीर राज्य में संविधान की धारा 356 लागू नहीं हो पाती थी. राष्ट्रपति के पास राज्य सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार ही नहीं था. यहाँ तक कि 1976 का शहरी भूमि कानून भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं हो पाया. भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते थे, जबकि भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का अधिकार है. भारतीय संविधान की धारा 360 यानी देश में वित्तीय आपातकाल लगाने वाला प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता था. जम्मू-कश्मीर में धारा 370 लगाते समय ये दलील दी गई थी कि यह एक अस्थाई व्यवस्था है लेकिन वास्तव में वह स्थाई रूप ले चुकी थी. पं नेहरू एवं कालांतर में बनी सरकारों की ढुलमूल एवं तुष्टीकरण की नीतियों के चलते धारा 370 का प्रावधान भी स्थाई हो गया है और कश्मीर की समस्या भी स्थाई हो गई है. तथाकथित बुद्धिजीवियों ने कश्मीर की आज़ादी या जनमतसंग्रह जैसे मुद्दे उठाकर इस समस्या को सुलझाने के बजाय उलझाने का ही काम किया है.  देश की एकता और अखंडता की बात करने वाले कथित बुद्धिजीवी कभी संविधान के अनुच्छेद 370 को कायम रखने की बात करते थे तो कभी जनमत संग्रह की वकालत करते रहे. 

डा. श्यामप्रसाद मुखर्जी
जब नेहरू सरकार ने जम्मू-कश्मीर में संविधान की धारा 370 लगाई तो डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इसका पुरजोर विरोध करते हुये मंत्रीमंडल से स्तीफ़ा दे दिया था. डा. मुखर्जी भारत की अखंडता के प्रबल हिमायती थे तथा अखंड भारत के स्वप्न दृष्टा थे. उन्होने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 लगाए जाने की कार्यवाही को भारत की अखंडता के विरुद्ध मानते हुये अपनी असहमति प्रकट करते हुये कहा था कि "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान − नहीं चलेंगे', लेकिन तुष्टीकरण की नीति के कारण नेहरू जी ने उनकी एक न सुनी. अंततः डा. मुखर्जी ने विरोध स्वरुप अपने पद से स्तीफ़ा दे दिया. संसद में भी डॉ. मुखर्जी ने धारा 370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की. उन्होंने अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा. अपने संकल्प को पूरा करने के लिये उन्होने 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने की चेष्टा की, सीमा में ही उन्हें गिरफ्तार कर नजरबन्द कर लिया गया. 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी. डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ऐसे राष्ट्र भक्त थे जिंहोने देश की एकता और अखंडता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया. उन्हें आज़ाद भारत का प्रथम शहीद कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी. 

देश में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो देशवासियों के मन में नई आशा की किरण जागी. केंद्र में आज एक दृढ़ इच्छा शक्ति वाली सरकार है. श्री मोदी ने जब गृह मंत्री के रूप में अमित शाह को चुना तो लोगों को यह विश्वास हो गया था कि जम्मू-कश्मीर की समस्या मोदी सरकार की प्राथमिकता में है. लोगों का विश्वास तब और दृढ़ हो गया जब श्री शाह ने गृह मंत्री के रूप में अपना दौरा कश्मीर से शुरू किया. इस दौरे में जो परिवर्तन देखने को मिला वो सबके सामने है. गृह मंत्री के दौरे के दौरान कश्मीर में पूरी तरह शांति थी, ना श्रीनगर के बाज़ार बंद हुये और ना ही गोला बारूद चला जैसा कि पहले देखने सुनने को मिलता था. पत्थरबाजी करने वाले भी अपने अपने घरों में दुबक गए थे. श्री शाह ने प्रदेश में कानून व्यवस्था की समीक्षा की तथा अमरनाथ यात्रा निर्विध्न सम्पन्न करने की योजना बनाई. 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के सिद्धांत पर चलते हुए इस समस्या को हल करने का प्रयास किया था लेकिन बहुमत के अभाव में उनकी इच्छा अधूरी रह गई थी. अब मोदी और शाह की जोड़ी ने डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सपने को साकार कर दिया है. कुल मिलाकर देश बदल रहा है तो कश्मीर को बदलना ही था. भारत में आज एक दृढ़ इच्छा शक्ति वाली सरकार है जो देश की एकता और अखंडता तथा देश की सीमा की सुरक्षा के लिए संकल्पित है.

अशोक बजाज रायपुर 

30 मई 2025

अहिल्याबाई होल्कर: इतिहास की विलक्षण दीपशिखा

 

01 अक्टूबर 2024

सेवा पखवाड़ा में सार्थक हो रहा प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान

 सेवा पखवाड़ा पर विशेष आलेख 

भारत में 1 लाख 71 हजार से अधिक निक्षय मित्र 20 लाख से अधिक टीबी रोगियों के मददगार बने  
                                                                                                                      - अशोक बजाज 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से 2 अक्टूबर तक चल रहे सेवा पखवाड़ा के तहत स्वच्छता, सफाई, रक्तदान एवं निशुल्क स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से देश भर में सेवा कार्य में लोग तल्लीन है. सेवा पखवाड़ा में नगर, गांव, गली, मोहल्लों, मजरों, चौपालों समेत सार्वजनिक व धार्मिक स्थानों पर सेवा कार्य के साथ साथ "प्रधानमंत्री टी. बी. मुक्त भारत अभियान" के अंतर्गत निक्षय मित्र योजना को भी अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है. इन दिनों काफी संख्या में लोग निक्षय मित्र बनकर टी.बी. मरीजों की भौतिक रूप से मदद कर रहें हैं. हम यह जानते हैं कि दुनिया में सबसे ज़्यादा टीबी यानी तपेदिक के मरीज़ भारत में हैं. दुनिया भर में प्रति वर्ष एक करोड़ से ज्यादा लोग टीबी की चपेट में आते है इनमें से एक चौथाई से ज्यादा भारतीय है. अमूमन हर साल भारत में 26 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित होते हैं तथा लगभग 4 लाख लोग इस बीमारी से मरते हैं. टीबी के मरीजों के समक्ष उपचार के दौरान होने वाले खर्च के अलावा पौष्टिक आहार की भी आवश्यकता होती है. सबसे ज्यादा समस्या आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तिओं को होती है क्योंकि काम करने में सक्षम ना होने के कारण उन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती. ऐसे में उनके समक्ष उपचार और जीवन यापन एक चुनौती बन जाती है. 

टीबी को लेकर विश्व के तमाम देश चिंतित है, इसीलिये सन 2030 तक विश्व को टीबी मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है. इससे एक कदम आगे बढ़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक लक्ष्य से 5 साल पहले यानी 2025 तक भारत को टीबी मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस कठिन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार के साथ साथ समाज की भागीदारी आवश्यक है. प्रधानमंत्री ने जन जन को इस अभियान से जोड़ने के लिए सन 2022 में "निक्षय मित्र योजना" की शुरुवात की है. ‘निक्षय मित्र योजना' के तहत कोई भी व्यक्ति, समूह या संस्थायें मरीजों को पोषण, उपचार व आजीविका में मददगार बनकर प्रधानमंत्री टी.बी. मुक्त भारत अभियान में अपना योगदान दे सकते हैं. यह पूर्णतः स्वेच्छिक योजना है, जिसके तहत व्यक्ति या संस्था द्वारा एक मरीज के लिए प्रतिमाह 500 रुपये का योगदान देना होता है. इस राशि से विभाग द्वारा मरीजों के उपचार के दौरान अस्पताल अथवा घर पहुंचा कर पोषण आहार की टोकरियाँ प्रदान की जाती है. कोई भी व्यक्ति अथवा संस्था कम से कम 6 माह तथा अधिकतम 3 साल के लिए एक अथवा एक से अधिक मरीजों को सहयोग प्रदान कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें स्वास्थ विभाग से पंजीयन कराना होता है, ऑनलाइन पंजीयन की भी व्यवस्था है. 

योजना प्रारंभ होने के बाद विगत दो वर्षों के भीतर भारत में अब तक 1 लाख 71 हजार से अधिक निक्षय मित्रों का पंजीयन हो चुका है. इनके योगदान से 20 लाख से अधिक टीबी रोगियों को 20 लाख से अधिक पोषण आहार की टोकरियाँ प्रदान की जा रही है. जहाँ तक छत्तीसगढ़ का सवाल है यहाँ लगभग 9000 लोगों ने निक्षय मित्र के रूप में पंजीयन करा लिया है इनमें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय एवं छग के स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल भी शामिल हैं. छत्तीसगढ़ में एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में लगभग 23000 टीबी रोगी हैं उनमें से 13646 रोगियों को पोषण आहार का पैकेट प्रति माह प्रदान किया जा रहा है. इसके अलावा राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन योजना के तहत सभी रोगियों को टीबी रोधी दवाओं के अलावा नि:शुल्क उपचार की सुविधा भी प्रदान की जा रही है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश तथा स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री जयप्रकाश नड्डा के मार्गदर्शन में यह योजना अब व्यापक जन आंदोलन का रूप ले चुकी है. 'निक्षय मित्र योजना' का प्रतिफल यह हुआ कि जन स्वास्थ्य एवं जन सरोकार से जुड़े इस अभियान में लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहें हैं. आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति, कारोबारी, स्वयंसेवी संस्थाएं एवं अर्द्ध सरकारी संस्थाएं 'निक्षय मित्र' बनने के लिए आगे आ रहें है. टी.बी. उन्मूलन की दिशा में जन भागीदारी बढ़ने से इस योजना को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा हैं. इस योजना से केवल रोगियों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं होती बल्कि निक्षय मित्र और इलाज करा रहे व्यक्ति के बीच एक आत्मीय संबंध भी स्थापित होता है. समाज में परस्पर सहयोग और सहानुभूति की भावना को विकसित कर टीबी के कलंक को जड़ से ख़त्म करने में यह योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. कुल मिलाकर सेवा पखवाड़ा में "प्रधानमंत्री टी. बी. मुक्त भारत अभियान" सार्थक सिद्ध हो रहा है.



टीबी हारेगा - देश जीतेगा