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13 अगस्त, 2010

भारत की विश्व को देन

भारत की विश्व को देन


 भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा। भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी। विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं। उसमें तो शायद हमको उनसे ही उल्टे कुछ सीखना पड़े। अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है। इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं।00304

                                              -  पं. दीनदयाल उपाध्याय

4 टिप्‍पणियां:

  1. दीनदयाल उपाध्याय जी के कथन में भारत की आत्मा की आवाज प्रवाहित हो रही है। बिना सांस्कृतिक उत्थान के विकास संभव नहीं है।

    अच्छी पोस्ट
    आभार

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  2. हम आज भारतीय संस्‍कृति की सीमाओं का विस्‍तार कर सकें तो श्रेष्‍ठ होगा तभी दीनदयाल जी के सपनों की दुनिया को साकार कर सकेंगे।

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